२०८३ असार १३, शनिबार
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कही–अनकही
“प्रेम ना बाड़ी उपजै, प्रेम ना हाट बिकाय”
विचार हिन्दी
लेखक और जननी कुछ एक जैसे
हिन्दी कविता
बुद्ध होता हुआ इश्क
हिन्दी कविता
खमोश वक्त
कही अनकही
“मोरा देहिया सहलो ना जाय”
कही अनकही
‘वीराँ है मयकदा, खुमो सागर उदास हैं, तुम क्या गए कि रूठ गए दिन बहार के’ फैज
कविता
मन में क्यों अवसाद भरा ?
कविता
फुर्सत
कही अनकही
जिन्दगी की गति धीमी जरूर हो गई है किन्तु घरों की दीवारें हँसने लगी हैं
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