२०८३ असार १३, शनिबार
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कही अनकही
बसन्त की ‘वसंत’ अप्राप्य का व्यक्त संगम
कही अनकही
रीत और प्रीत की निश्छल गाथा, “रे मन..चल सपनों के गाँव”
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यकीं है मेरा दावा नहीं, कोई तुझसा इस जहाँ में नहीं : बसन्त चौधरी
कही-अनकही
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कही-अनकही
एक सूफियाना खुशबू और फकीराना रंगत थी अमृता के इश्कमें
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जो बीबी से धकियाये गये वो नामी हुये
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