‘केसरिया बालम आओ णी पधारो म्हारे देश....’ - Aksharang
  • २०७८ जेठ ४ मङ्गलबार

‘केसरिया बालम आओ णी पधारो म्हारे देश….’

डा.श्वेता दीप्ति

डा.श्वेता दीप्ति

राजस्थान, रंगरंगीला राजस्थान जुवान पर ये नाम आता है और साथ ही लब गुनगुना उठते हैं, ‘केसरिया बालम आओ णी पधारो म्हारे देश….’ । आइए आज कही– अनकही में आपको ले चलती हूँ, आसमान तक ऊंचे रेत के धोरे और रेत की ही सुनहरी चादर में लिपटी जमीन । दूर–दूर तक दिखता रेत का अनंत सैलाब या फिर नीला सूना अंबर जिसके दामन में अक्सर बादल का एक टुकड़ा भी नहीं होता उस राजस्थान में और उसकी फिजाओं में गूँजती केसरिया बालम ….की जान अल्लाह जिलाई के पास । वैसे तो राजस्थान कहते ही इसके अलावा याद आता है बलिदान, शौर्य और अदम्य साहस । हो सकता है कि आप कभी राजस्थान न गए हों । लेकिन यह तय है कि राजस्थान आप तक कभी न कभी जरूर आया होगा । कभी गले में गोरबंद लटकाए ऊंट पर सवार होकर, कभी दाल–बाटी–चूरमा के साथ थाल में सजकर और कभी ‘केसरिया बालम’ का सुर बनकर । केसरिया बालम यानी एक मीठी सी मनुहार जिसे गाकर पाहुनों को अपने ‘देश’ में न्यौता दिया जाता है । शायद इस मनुहार की मिठास का ही असर है जो राजस्थान की सूखी धरती की तरफ देशी–विदेशी मेहमान अनायास ही खिंचते चले आते हैं ।

केसरिया बालम …राजस्थान का पर्याय बन गया है । सभी ने इसे कभी–ना–कभी सुना ही होगा पर आज इसे गाने वाली मूल गायिका अल्लाह जिलाई की बात करुँगी । केसरिया बालम आओ णी पधारो म्हारै देश गीत प्रख्यात मांड गायिका अल्लाह जिलाई बाई के कंठों से निकलकर अमर हो गया । अल्लाह जिलाई बाई का जन्म १ फरवरी १९०२ को हुआ । बीकानेर के राजदरबार में गुणीजनखाने के उस्ताद हुसैनबक्श लंगड़े ने उनकी प्रतिभा को निखारा ।
तेरह वर्ष की आयु में ही उसने अपने कंठ के सुरीलेपन से बीकानेर महाराजा गंगासिंह को प्रभावित कर दिया । महाराजा ने उसे राजगायिका के पद पर प्रतिष्ठापित किया । उन्होंने बाईस वर्ष तक राजदरबार में अपनी गायकी से चमक बिखेरी ।

केसरिया बालम अब राजस्थान की संस्कृति का अभिन्न प्रतीक बन चुका है । ढोला मारू की प्रेम कहानी से जुड़ा यह लोकगीत न जाने कितनी सदियों से राजस्थान की मिट्टी में रच–बस रहा है. लेकिन माटी के इस गीत को सम्मान के सर्वोच्च शिखर तक पहुंचाने नाम था अल्लाह जिलाई बाई जिन्हें पूरी दुनिया में मरू कोकिला और बाई जी के नाम से जाना जाता है । अल्लाह जिलाई बाई के भीने–भीने स्वर रेतीले राजस्थान में बारिश की कमी को पूरा कर देते थे । कहते हैं कि मरूस्थल की इस बेटी की मखमली आवाज जब बियाबान रेगिस्तान में गूंजा करती थी तो जैसे यहां की बंजर धरती की आत्मा भी तृप्त हो जाती थी ।

अल्लाह जिला बाई ने सबसे पहले केसरिया बालम बीकानेर महाराजा गंगासिंह के दरबार में गाया था । ये वही गंगासिंह थे जिन्होंने पहले विश्वयुद्ध में युद्ध में अंग्रेजों की तरफ से भाग लिया और ‘गंगा रिसाला’ नाम से ऊंटों की एक सेना बनाई थी जिसके पराक्रम को (पहले और दूसरे विश्वयुद्ध में) देखते हुए बाद में इसे बीएसएफ में शामिल कर लिया गया ।
केसरिया हो या मूमल या पणिहारिन या फिर गोरबंद, बाई जी ने राजस्थान की उस साझी लोक विरासत को प्रस्तुत किया जो भक्ति–सूफी काल से यहां चली आ रही थी । कहना गलत नहीं होगा कि बाई जी उसी मिली–जुली संस्कृति की वारिस थीं जिसे मीरा, दादू और मोइन्नुद्दीन चिश्ती जैसे संत–फकीरों ने मिलकर सींचा था । यह शायद उसी गंगा–जमुनी तहजीब का कमाल था जो इस्लाम से ताल्लुक रखने वाली बाई जी के स्वर पाकर ‘हिंदू केसरिया’ निखर गया था ।

राजस्थान की इस मिली–जुली तहजीब को हमेशा अपने दिल में संजोए बाई जी और उनकी आवाज बीकानेर राजपरिवार में नई किलकारी गूंजने से लेकर शाही बारात के स्वागत तक तमाम हिंदू रस्मों से कभी न अलग होने के लिए जुड़ चुकी थीं ।
मांड गायन की जिस शैली में राजस्थान से ज्यादातर खूबसूरत गीत आते हैं वे उसकी शीर्ष गायिका हैं । उनसे पहले भी कई रहे लेकिन कोई मांड का चेहरा नहीं बन पाया.

म्हाने पीवरीए ले चालो सा,

पीवरीए री म्हाने ओलू आवे..

बहू अपने पीहर ले चलने का अनुरोध करती है । जब मोबाइल नहीं हुआ करते थे, चिट्ठी लिखनी नहीं आती थी, तब लड़की अपने परिवार साल–दो साल–तीन साल बाद जा पाती थी और विवाह और ससुराल की तमाम जटिलताओं का कोई उपाय न होता था । ऐसे में जब भी पीहर मां–पिता के यहां जाना सौ सुखों से बढ़कर होता था । ‘छोटी सी उमर क्यों परणाई रे बाबोसा’ को सुनकर मारवाड़ में बूढ़ी महिलाओं की आंखों से भी आंसू फूट पड़ते हैं । बाई सा रा बीरा.. उसी भाव का गीत है ।

अल्लाह जिला बाई जी बेहद विशिष्ट थीं । वे मांड की पर्याय बनीं । वे सबसे वरिष्ठ थीं, अनुकरणीय थीं । उनकी गायकी में एक सुकून है, एक ठहराव है, कोई हड़बड़ाहट नहीं, एक परिपक्व आत्मविश्वास है । उनकी आवाज जैसे भाव, सादगी और ग्रेस जÞहन पर अमिट हो जाती है । उनके बाद जन्मीं बेगम अख्तर और बाई जी दोनों में एक समानता ये भी है कि उनकी आवाज में हमें बुलाती है आत्मा की गहराई से । बाई जी का गाया हर गीत राजस्थान के दृश्यों को जिंदा कर देता है, संस्कृति की खुशबू फैल जाती है । इसे आप ‘केसरिया बालम आवो नी’ में भी महसूस कर सकते हैं । केसरिया बालम आवो नी पधारो म्हारे देश.. इसे लता बाई ने गाया, शुभा मुद्गल ने भी .. लेकिन उनका बालम केसरिया नहीं हो पाया । केसरिया करने का अंदाज सिर्फ अल्लाह जिलाई बाई के पास है ।

शहनाई लैजेंड उस्ताद बिस्मिल्लाह खां साहब (भारत रत्न) जब भी बीकानेर आते उनसे जरूर मिलते थे । उन्हें १९८२ पद्मश्री दिया गया । हालांकि बहुत लोग मानते हैं कि वे भारत रत्न की हकदार थीं । आप ये बिलकुल नहीं जानते होंगे कि पाकीजÞा फिल्म का गाना ठाड़े रहियो, ओ बांके यार.. पहले उन्हें पेश हुआ था । लेकिन फिल्म में केसरिया बालम गाने से पहले लता मंगेशकर ने फोन करके उनसे इजाजत ली थी । जाहिर है यह लता की भी विनम्रता थी.इस २१ वीं सेंचुरी में जब पढ़ी–लिखी महिलाएं भी आत्म–निर्भरता के तीन नियम (आर्थिक निर्भरता, निडरता से जीवन का हर फैसला खुद लेना, समाज की रूढि़यों की परवाह न करना) भी पूरे नहीं कर पातीं । पर बाई जी ऐसी थी जो शिक्षित न होते हुए भी, सामंती समाज में रहते हुए भी आत्मनिर्भर और आधुनिक महिला होने की मिसाल थीं । इस मामले में उनके जीवन निर्णय फौलादी रहे ।

जर्दे की खुशबू के साथ जब महफिल में अल्लाह जिलाई बाई सुर लगाती थीं तो हर बालम केसरिया होने को मजबूर हो जाता था । हैमलिन स्नो परफ्यूम लगाने वाली एक दबंग महिला जिलाई बाई हर साज और शब्द को अहसासों से इस कदर जिंदा करने का हुनर रखती थीं कि उन्हें सुनने वाले महफिल से उठने की हिमाकत तक नहीं कर पाते थे ।

आपका दैहिक अवसान ३ फरवरी १९९२ को हुआ पर राजस्थान का यह सुर आज भी और सदियों तक हमें आत्मिक सुख देता रहेगा ।