• २०७९ असोज १९ बुधबार

जिन्दगी की गति धीमी जरूर हो गई है किन्तु घरों की दीवारें हँसने लगी हैं

डॉ.श्वेता दीप्ति

डॉ.श्वेता दीप्ति

समय बदल रहा है । वह सुबह जो अक्सर गाडि़यों के हॉर्न के शोर से शुरु होती थी आज उसमें चिडि़यों के कलरव शामिल हैं । सड़कों पर एम्बुलेन्स की आवाजें नहीं आ रहीं । आज दूरियाँ दवा बन रही हैं जो शायद आने वाले कल के लिए एक परम्परा भी कायम करे जिसकी नींव हमारे धर्म और आस्था पर थी । बच्चे भी बदल रहे हैं । माँ की व्यस्तता उन्हें दिखने लगी है । घर की बडि़याँ और होम मेड नाश्ता मन को भा रहा है । यानि जिन्दगी की गति धीमी जरूर हो गई है किन्तु घरों की दीवारें हँसने लगी हैं । सुबह रामायण का फिर से इंतजार हो रहा है । बच्चे फिर से भ्राताश्री और पिताश्री का अर्थ पूछ रहे हैं और कमोवेश अपनी पौराणिक गाथा को जानना चाह रहे हैं ।

हमारे बीच की संवेदनाएँ कम हो रही थीं । एक मशीनी जीवन जीने की बाध्यता थी क्योंकि हमें अपनों के लिए बहुत कुछ करना था । पर इन सबके बीच ही हम अपनों को ही खो रहे थे । भागती हुई जिन्दगी का हिस्सा बन कर क्या हम खुश थे ? क्या सुकून के चंद पल हमारे अपनों के हिस्से में था ? नहीं । काम का तनाव हमें घर में अपनों से ही दूर कर रहा था और आज उनके बीच ही एक ऐसा वक्त हम गुजार रहे हैं जहाँ विश्व परिदृश्य के इस भयंकर वातावरण को देखकर चिन्ता है पर सुकून भी है । हम खुशियाँ और सुकून होटल और रेस्टोरेन्ट में खोज रहे थे । अँग्रेजी धुन और नशे में बहकते कदम की परिपाटी शायद आने वाले समय में कम हो जाए क्योंकि अब डरने का समय है, अपनों से जुड़ने का समय है । पश्चिमी संस्कृति ने जो विभत्सता कायम की थी उससे निकलने का समय है । अपनों का साथ ही हमें सुरक्षा प्रदान कर सकता है यह समझने का समय है । गैरों के गले मिलना, औपचारिकता निर्वाह के लिए हाथ मिलाना या चुम्बन लेना ये सब आगे के समय में हमें डराने वाला है । शालीनता और हमारी सभ्यता जो कहीं पाश्चात्य सभ्यता की बलि चढ़ गई थी उसे फिर से अपने जीवन में लाने का यह समय है ।

हमने प्रकृति का दोहन किया, हमारे खानपान, रहनसहन में एक ऐसा बदलाव आया जिसने हमारे अन्दर एक राक्षसी प्रवृत्ति को जन्म दिया जिसका असर हमारी मनोवृत्ति पर पड़ा । इन सारी बातों या बदलाव पर आज मंथन की आवश्यकता है । यह समझने की आवश्यकता है कि हमारे पूर्वजों की जीवनशैली और उनके द्वारा गठित मूल्य और मान्यताएँ गलत नहीं थी । हम उससे दूर भाग आए पर आज आवश्यकता इस चीज की है कि उसे आज की जरुरत के हिसाब से हमें अपने जीवन में शामिल करना चाहिए ।

गीता में कहा गया है, बेकार की चिंता हम क्यों करते हैं, बेकार में ही हम किसी से क्यों डरते हैं ?कोई भी हमें मार नहीं सकता .आत्मा अजÞर अमर है, आत्मा न कभी जन्म लेती है और न ही कभी मरती है । इस संसार में जो हो रहा है अच्छा ही हो रहा है, जो भी अब तक हुआ है वो भी अच्छा ही हुआ है और आगे भी जो होगा वो अच्छा ही होगा । जो बीत गया उसके लिए पश्चाताप करने से कुछ भी हासिल होने वाला नहीं है, आने वाले वक्त की चिंता हमें नहीं करनी चाहिए ।.अपने वर्तमान को जीने में ही समझदारी है । परिवर्तन इस संसार का नियम है और मृत्यु जीवन का अटल सत्य है ।  फिर क्यों ना हम अपने आप को भगवान् के समक्ष अर्पित कर दें, यही सबसे उत्तम सहारा है और भय ,चिंता और शोक से मुक्ति पाने का एक सर्वश्रेष्ठ मार्ग भी है ।

आज समय ने जो चोट दी है उससे सीख लेना और अपने जीवनशैली में एक सार्थक बदलाव लाना शायद आज के वक्त की माँग है और यही हमें शांति प्रदान कर सकता है ।