• २०८२ फाल्गुन २२, शुक्रबार

होली

अनिल कुमार मिश्र

अनिल कुमार मिश्र

सबके जीवन में दर्द बहुत है
अब वह होली दूर बहुत है
गाँव में सबका मिलकर आना
होली जलाना, स..र..र..र गाना
प्रेम से मिलना, प्रेम से गाना
करताल, ताल पर होली गाना
वह दहन-होलिका दूर बहुत है
अब तो होली क्रूर बहुत है ।

ना अपनापन, ना कोई माया
नज़र जहाँ, नफ़रत का साया
ना मात-पिता, ना बंधु-भगिनी
ना मालपुआ में स्वाद है सजनी
ना बड़ा-दही, ना इमली चटनी
कोई प्रेम नहीं, सब क्रूर बहुत हैं
अब वह होली दूर बहुत है ।

रंग का लगना और लगाना
घर-घर जाना प्रेम दिखाना
सब घर के दरवाजे खुलना
दिल का मिलना, दिल से मिलना
आह..आज यह दूर बहुत है
अब वह होली दूर बहुत है ।

सुबह पिता का सबको जगाना
होली का भभूत लगाना
तरह-तरह के रंग बनाना
क्यों वह होली दूर बहुत है
अब यह होली क्रूर बहुत है ।

फिर भी दिल से सबसे मिल लें
मन में बसे उस स्नेह से मिल लें
रंग-रंगीली होली आयी
देखो मित्रों की टोली आयी
आनंद तो है पर हूक बहुत है
अब वह होली दूर बहुत है
अब वह होली दूर बहुत है ।


-अनिल कुमार मिश्र, राँची, भारत ।