• २०८१ श्रावाण ८ मङ्गलबार

जिंदगीका हिसाब–किताब

बसन्त चौधरी

बसन्त चौधरी

बढता जा रहा है एकाकीपन, डूबता जा रहा है सूरज !
कोहरे में घुली हवा लेते- लेते
उफ ! विरक्त हो रहा है समय !

कहाँ है ऋतु में ऋतु का स्वभाव ?
मेरे भीतर जाने क्यों कहीं कुछ हो रहा है
टुटता जा रहा है आभास !

मैं खुद, खुद से फिसलता जा रहा हूँ
मैं देखता जा रहा हूँ अपना ही हस !
खिलती हैं मेरे भीतर उत्साह की कलियाँ
लेकिन फिर तुरंत ही पीली पड जातीं हैं
कहीं ऐसा तो नहीं कि मेरा मन मुझसे मांग रहा है अवकाश ?
कि मेरा मन मुझसे ही चुक्ता कर रहा है कोई हिसाब ?
या समय की आँखो के तराजू में यही हो गया हो बेहिसाब ?

ऐ समय ! मैं हाथ जोडता हूँ, मुझे परेशान न कर !
वैसे ही मैं परेशान हूँ अपने आलसपन से ।

मुझे अपनी सुविधा के अनुसार
मेरे भीतर के आकाश का विचरण करने दो !
जीने के नाम पर दौडते दौडते थककर चूर हो चुकह हूँ
सोने से पहले कुछ पल ही सही जीने की अनुभूती करने दो !
ऐ गोधुलि ! मुझे सहजता से सांस लेने दो !

साभार: चाहतों के साये मेंं


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(चौधरी विशिष्ट साहित्यकार हैं ।)