• २०८१ असार २ शनिवार

कोना

बसन्त चौधरी

बसन्त चौधरी

हमेशा जरूरत महसूस होती है
हर एक मकान में
एक बेहतर कोने की
एक ही नहीं अनेक कोने की

ऐसा भी नहीं कि
मकान में कोने नहीं होते
होते हैं, क्योंकि उसी कोने पर
टिकी होती है मकान की आधारशिला
उनमें से ही कुछ कोने
निर्मित किये जाते हैं
किसी सजावट की खातिर
तो कभी आगन्तुक अतिथी की
आवभगत की खातिर
बावजूद इसके एक जिम्मेदार कोना
जरूर हो हर एक मकान में

जी हाँ ! जिम्मेदार !
जो न सजावट हो
न ही बतियाता हो
एक निस्तब्ध कोना
जहाँ रखा जा सके पुराना
कबाड ही नहीं,
जीर्ण–शीर्ण होता बूढा शरीर भी ।
जिसे हर आने वाला मेहमान
निहारे किसी प्रिय धरोहर की तरह !
और
आस्था या अनास्था के
श्रद्धा–पुष्प अर्पित करें
हाथ जोड कर या बेरूखी से
चुपचाप आगे बढ् जायें
अपने अन्तस् में
खालीपन का अहसास लिए
जरूरी है ना एक ऐसा कोना ?

साभार: अनेक पल और मैं (कविता संग्रह)


[email protected]
(चौधरी विशिष्ट साहित्यकार हैं ।)