• २०८१ श्रावाण ९ बुधबार

प्रेम के बाद

जया जाद्वानी

जया जाद्वानी

सबकुछ वही रहेगा
घर- आंगन- बगिया
पेड़- पौधे- मौसम
फिरजाने किस वक्त
हरीतिमा चली आयेगी
अन्दर आंगनमें
पंखेके ऊपर
चिड़िया बनायेगी घोंसला
और हम देखेंगे
उसे बरजे बगैर
फिर किसी बरसातमें
हम चलायेंगे सपनोंकी नावें
और डूब जाने पर
उदास नहीं होंगे
हम बैठे रहेंगे तमाम वक्त
उसी वृक्षके नीचे
सदियों तुम्हारी प्रतीक्षामें
हम लड़ते रहेंगे
जीवनकी क्षुद्र लड़ाइयां
खून और पसीनेसे लथपथ
बगैर थके या हारे
और शामको
जोर जोरसे पढ़ेंगे
प्रेम कविता
सिरहाने रखी !


कस्तुर्बा नगर जह्र्भाट इबलासपुर, भारत