• २०७९ मंसिर २१ बुधबार

कभी–कभी

डॉ मुक्ता

डॉ मुक्ता

कभी- कभी मन में
सहसा यह प्रश्न कौंधता
क्यों अहंनिष्ठ मानव
रिश्तोंकी अहमियत को नकार
संबंध- सरोकारों को तज
अजनबीपन का एहसास लिए
अपने- अपने द्वीप में कैद
आत्मकेंद्रित होता जा रहा
सोचता हूं, बावरा मन
क्यों मुक्त नहीं हो पाता
मोह- माया के जंजाल से
स्व- पर के बंधनों में लिप्त रहता
और राग- द्वेष के व्यूह से
बाहर नहीं निकल पाता
कैसी यह मानवकी नियति
और कैसा जग- व्यवहार
जिसमें रचा- बसा मिथ्या संसार
कभी- कभी मन
चिन्तन- मनन करने को
विवश हो जाता
क्यों मृग मरूभूमि में
दौड़ता चला जाता
कस्तूरी- गंध की तलाश में
जो उसकी नाभिमांहि बसती
उसी प्रकार बावरा मन
प्रभु की तलाश में
मंदिर, मस्जिद, गिरजा, गरुद्वारे की
धूल फाँकता, आजीवन भटकता रहता
परंतु अपने अंतर्मन में नहीं झाँकता
जहाँ वह सृष्टि- नियंता बसता ।


डॉ मुक्ता, वरिष्ठ साहित्यकार, गुरुग्राम हरियाणा, भारत