• २०८१ असार ११ सोमबार

पर्दे के मगरूर !!

डॉ सत्यवान सौरभ

डॉ सत्यवान सौरभ

सौरभ मेरी गलतियां, जग में है महशूर !
फ़िक्र स्वयं की कीजिये, पर्दे के मगरूर !!

कहाँ मनों में भावना, कहाँ दिलों में प्यार !
रिश्ते ढूंढें फायदे, मानों कारोबार !!

मैं कौवा ही खुश रहूँ, मेरी खुद औकात !
तू तोते-सा पिंजरे, कहता उनकी बात !!

मैं तुमको हँसता मिलूं, डालों जितने जाल !
तेरी जो है ख्वाहिशें, तो मेरे हैं ख्याल !!

मुहँ उठाये कोठियां, बेच चुकी ईमान !
तभी अकेला कैद है, पांवमोड़ इंसान !!

सबंधों की टूट के, क्या बतलाऊँ भेद !
नाव फँसी मझदार में, नाविक करते छेद !!

अपने अपनों से करें, दुश्मन-सा व्यवहार !
पहले आंगन में उठी, अब छत पे दीवार !!


डॉ सत्यवान सौरभ (हरियाणा भारत)
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