• २०७९ असोज १६ आइतबार

प्राॅपर्टी

संजय सिंह

संजय सिंह

“आप अकेले रहते हैं क्या ? “मैंने कुछ देर बैठने के बाद पूछा ।
” मैं अकेला कहाँ रहता हूँ ।”बुजुर्ग ने आत्म-दीप्त आभा से भर कर कहा,” मैं तो अपनी प्राॅपर्टी के साथ रहता हूँ….”
“कौन सी प्राॅपर्टी ?” मैं अकबकया,” यहाँ तो कुछ नजर नहीं आ रहा… कहाँ है आपकी प्रापर्टी… कौन सी प्रापर्टी ?? “एक छोटे से खण्डहर मकान में रह रहे बूढे के पास प्राॅपर्टी जैसी कोई चीज दिखती नहीं थी, निर्जन एकांत और उदासी के सिवा, पर. ..
वह गुमा गया । कुछ पल सोचने के बाद उसने कहा, “कहानी लम्बी है… तब मैं जय सिंह था, बाद में जोसेफ बना उस लड़की के प्यार में… बिरादरी से बदर होने के बहुत बाद यहाँ एक घर बनवाया… इस पहाड़ी के बीच… वहाँ चर्च देख रहे हैं आप… उसके उस तरफ एक मिशन स्कूल स्कूल में पढ़ाती थी जूली । उसके बचपन में ही उसके पिता ने क्रिश्चियन बन कर ईसाई धर्म स्वीकार कर लिया था, और वह जूही से जूली हो गयी.. एक परिवेश मिला, एक करियर पिता के फैसले से….”
“महोदय आपसे उसका परिचय कैसे हुआ ?” मैंने मुस्कूरा कर फिर पूछा, ” क्या आप भी उसी स्कूल में पढ़ाते थे ?”
” नहीं मैं तो एक नाट्य केंद्र से जुड़ा था । हमारी संस्था ड्रामा और नृत्य के लिए ख्यात थी । जूली भी स्कूल के बाद शो में भाग लेती थी.. वह नाटक के साथ नृत्य में भी निपुण थी..”
” फिर ?”
” ड्रामा के दौरान न जाने कब हम एक-दूसरे को प्यार करने लगे…”
“आपको इजली आपका प्यार मिला, जूली मिली ।” मैंने सिगरेट सुलगा कर कहा बुजुर्ग वाकई दिलचस्प आदमी था । मुझे ऐसे आदमी से मिलकर तसल्ली होती थी । लगता था कि जीवन में बहुत कुछ है, जिसके बारे में सटीक कयास नहीं लगाया जा सकता।इससे सब कुछ जान लेने का भ्रम होता है… जो बस एक बेवकूफी के सिवा कुछ नहीं ।

मेरा तंज निशाने पर लगा था !
उसके चेहरे पर कई भाव आकर चले गए । वह स्मृति की किसी दुनिया में विलमने के बाद बोला, “इजली प्यार नहीं होता, आप में बहुत कुछ काॅमन होता है, तो बहुत कुछ उल्टा भी । मैं हिंदू था, तो वह क्रिश्चियन… यह संबंध उसके पादरी पिता के स्वीकार नहीं था… हमारे बीच बहुत सी उलझनें थी…”
“प्रेम में यह सब भी होता है ?”
“होता है, परिवेश, संस्कार और …
“तब ?”
“अब बताकर भी क्या होगा ?” वह उठा और टी पाॅट में चाय बनाकर ले आया । काली पत्ती की कड़क चाय जो सर्दी और और बारिश के मौसम में बड़ी लज्जत वाली होती है… हमें इस वक्त इसकी तलब हो रही थी । पहाड़ पर बारिश हो रही थी । बारिश से बचने के लिए ही मैं इधर आ गया था और… चाय खत्म होने के बाद बुजुर्ग ने कहा, “आपने अपने बारे में कुछ बताया नहीं ? आप कौन हैं, इधर कैसे आ गए ?”
“मैं आपको सब कुछ बताऊँगा…”मैंने आराम से कहा, “मेरे पास काफी समय है । दरअसल आप कुछ कह रहे थे…”
“मैं तो यह कह रहा था कि कुछ चीजें कभी-कभी विपरीत होती हैं… नाटक करने के कारण मैं पहले से घर के लिए एक औरांग-उटांग था, बाद में जूली के प्रेम में जब धर्म बदल कर जोसेफ हो गया, तो सब के लिए बेगाना हो गया…”
“लेकिन यह काम तो जूली भी कर सकती थी…?”
मैंने प्रतिवाद किया ।
“कर सकती थी, पर मेरी तलब ज्यादा रही होगी । “उसने तल्खी से कहा,” प्रेम में मैं और वह क्या… जय सिंह भी वही, जोसेफ भी वही… हमने चर्च में अंगूठी फेर कर शादी कर ली…”
“चलिए, मैं वह नहीं पुछूँगा । ” मैंने अपनी गलती स्वीकार कर ली,” किसी के फैसले को छोटा करने के हक में मैं नहीं हूँ…. प्रेम में जो होना होता है, उस पर अख्तियार भी क्या होता है…”
“एग्जेक्टली !हमने यह घर बनाया… हम बहुत खुश थे… धर्म बदलने के बाद मै ईश्वर के परम रूप के और करीब हो गया था… अपने जहनो-सहन के पार मैं धरती, चाँद, बादल.. चिड़िया ,फूल सब में उसके स्फटिक रूप को देख सकता था.. हवा जूली… फूल जूली… चिड़िया जूली… नदी जूली…धरती और आकाश के हर रंग में प्रेम का वही नूर….”
मुझे लगा बुजुर्ग खुद पानी और हवा में बदल गया है… तभी उसकी हिचकियों से गला रुन्धने का अहसास हुआ…
“आप रो क्यों रहे हैं ?”
” उस पहाड़ पर जूली की कब्र थी ।”
” मतलब ?
“पिछले साल के भूकंप में पूरी पहाड़ी ध्वस्त हो गयी…” बुजुर्ग ने कहा,” बाद में मैं उसकी टूटी हुई कब्र की रेजगारियाँ उठा लाया..”
“भाई साहब ! मेरी बहन मरी कैसे ? “मैंने बेचैन होकर कहा, “पहले वह तो बताइए…. मैं उससे मिलने आया था…”
“आप जूली के भाई हैं…?”
“जी..”
“आपका नाम ?”
“श्रीधर ।”
“मुझे मालूम है कि धर्मांतरण केवल आपके पिता और बहन ने किया था… आपकी माँ तैयार नहीं हुई थी,  तब आप गोद में थे…”बुजुर्ग ने संवेदना से भर कर कहा, “मुझे जूली ने सब बताया था… आप लोगों ने अपना रिश्ता घर्मभ्रष्ट मानकर तोड़ लिया था उन लोगों से…”
“यह सच है, पर, अब जब मैं जय और जोसेफ के अभेद को समझ सका हूँ, तो मैं दुखी हूँ कि जूही मर चुकी है…. “मैं एक साँस में बोल गया., “उससे मिल कर कितना सुखद होता बरसों से बिछड़े दो ध्रुवों का मिलन… कितनी आकस्मिक पर खुशी गहरी खुशी होती…
“उसे निमोनिया हो गया था । डाॅक्टरों के काफी इलाज के बाद भी वह बच नहीं सकी… डा.फ्रांज ने बहुत कोशिशें कीं… बहुत प्रेयर किया… उसने मौसम पर अफसोस जताया… निमोनिया बारिश के मौसम में सबसे खतरनाक बीमारी है… मैं हमेशा उसकी तिमारदारी में लगा रहा..शो में नृत्य करने वाली, अपने संवादों और अदाकारी से सबका दिल जीतने वाली जूली अंतिम दिनों में बहुत अशक्त हो गयी थी… लेकिन मैं जानता हूँ,… फ्लावर्स डाॅय बट फ्रेग रेंस नाॅट डाय… प्रेम का वह घरौंदा आज भी अविस्मरणीय है, यह घर अब मेरे भीतर आबाद है… जूली की उपस्थिति के मैं महसूस कर सकता हूँ वह आती है चुपके से मेरे सिरहाने में फूल रख जाती है… कोई माने या नहीं माने पर मेरे साथ ऐसा होता है, वह कोई संवाद बोल कर चली जाती है…”जो देर तक हवा में फड़फड़ाती रहती है.. आई एण्ड यू…दिस टाइम, क्रियेशन एण्ड दि यूनिवर्स… ओनली फ्राॅम यू एण्ड मी….
अब तक मैं सहज हो चुका था । जूही से मिलने का मेरा सपना इतनी कठिन यात्रा के बाद निष्फल हो गया था । धर्म बदलने से, देश बँटने से रिश्ते नहीं टूटते… मैं सही लोकेशन पर था । वैसे जिस बारिश ने जोसेफ से मिलाने में देवदूत बनकर मेरी मदद की थी, वह थम चुकी थी । शाम घिरने लगी थी ।
“तो मुझे क्या करना चाहिए ?”
“आप रुकें…” बुजुर्ग ने कहा ।, “आप खुद कष्ट में रह रहे हैं, आप पर आतिथ्य का बोझ सही नहीं होगा… मुझे कहीं टिका दें या किसी रेस्ट हाउस में…” मैंने संकोच प्रकट किया ।
“नहीं-नहीं” बुजुर्ग ने उसी संवेदनशीलता के साथ कहा, “कल मैं चर्च गया था, फिर बाजार… रसद है मेरे पास… जूली भी मानती थी कि आर्टिस्ट के साथ .. मैं बेहतर कुक भी हूँ…..”
….
रात में भोजन के बाद सहसा मुझे कुछ याद आया, तो मैंने पूछा,” हाँ आप किसी प्राॅपर्टी की बात कर रहे थे दोपहर में…..यह जूली की है कि आपकी ?”
“दोनों की…हाँ अनमोल प्रापर्टी है मेरे पास…”उस आदमी ने मुस्कूरा कर कहा,” पर अब संभालना मुश्किल है… इतनी सर्दी और बारिश मे देख-भाल मुश्किल है… एक महीने से ताला बंद है….कहीं जाता भी हूँ , तो चिंता लगी रहती है…. इस बार आसमान ने कहर बरपाया है….”
“आप बेच क्यों नहीं देते ?”
“हर चीज का खरीददार नहीं होता और न हर चीज बिकती है…”उसने अकठ कर कहा,” दिस इज माॅय प्रापर्टी… नाॅट सेलेबुल…”
“खैर यही सही… आप दिखाना चाहेंगे ?”
“क्यों नहीं ?” उसमें स्फूर्ति सी लौट आयी ।
“चलिए ।” कौतूहल वश मैं भी उठ गया ।
….
हम सोने के कमरे से गलियारे में चल कर बगल के एक कमरे में आए । बुजुर्ग ने लाइट बोर्ड का स्वीच आन किया । पीतल के ताले की चाभी घुमायी । हम दूधिया रौशनी से नहा गए । कमरे में एक स्त्री की मोम की मूर्त्ति थी, जिसे चूहे ने कुतर दिया था । एक कोने में एक बुसी हुई कब्र थी, एक पुराना सा पियानो… फ्राॅकऔर कुछ स्कर्ट थे… बीच में मेज और कुछ कुर्सियाँ…. मेज पर मेरी मरियम और ईसा मसीह की मूर्त्तियाँ….एक दो गोदरेज… संदूक….”
“तो यही है आपकी प्राॅपर्टी ?”
“जी !”
“पर बहुत दिनों से बंद होने के कारण कमरा बुस गया है… आज खुला रहने दीजिए….” मैंने खिन्न होकर कहा ।
“नहीं, नही…”वह चौंका,” मैं यह रिस्क नहीं ले सकता…”
“इसमें है क्या ? कुछ भूली-बिसरी यादें…”
” मि. श्रीधर” ताला लगाते हुए उस बुजुर्ग ने कहा,” आपने कभी नाटक देखा है ?”
“देखा है….”
“मान लीजिए मेरे और जूली के प्रेम पर नाटक ?” वह मुड़ा,” नाटक मिन्स फाॅलोइंग दी रीयलिटी…. तो उस कहानी के घटनाक्रम.. उसकी स्मृति और प्रभाव को जो चीजें विश्वसनीय बनाती हैं, वही उस प्रेम की प्राॅपर्टी है…. मेरा मतलब.. उस इतिहस और स्मृति को जो सजीव करे… नाॅव जूली इज हीयर… सी केन नेभर डाइ…”
मैं अवाक था ! इस क्षण वह बुजुर्ग सचमुच सनकी अमीर था । इस निर्जन एकांत में दृश्य और अगोचर शक्तियाँ जब उसके अहसास को फूल-पत्तियों से भर देती होंगी, तो उसका चेहरा झुर्रियों के पार से भी चमकने लगता होगा । एक फुदकती गौरैया उन फूलों पर…ओह ! मैं बुदबुदाया,” ही केन नेभर डाय…. प्यार में कोई मरता नहीं… तो क्या सचमुच मेरी यह यात्रा निष्फल रही थी ?… नहीं, कभी नहीं !


(संप्रत्ति: प्रिंसिपल,पूर्णिया महिला काॅलेज सालमारी, कटिहार, विहार, भारत)
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