सम्बन्धों की कारा - Aksharang
  • २०७८ असार ५ शनिवार

सम्बन्धों की कारा

डॉ मुक्ता

डॉ मुक्ता

वह कृशकाय रिक्शावाला भोर होने से पहले ही चौराहे पर खड़ा हुआ मिलता था ताकि उसे सवारी मिल सके ।
बाबा ! आज तुम समय से पहले ही यहां आ गए ।
तुम्हारी तबीयत भी खराब सी दिखाई पड़ रही है ।
नहीं..नहीं ! ऐसा कुछ विशेष नहीं है। रात को बुखार था । नींद नहीं आ रही थी…सो !  चला आया ।
बाबा तुम्हें बच्चों ने रोका नहीं ।
बच्चे ! किसके बच्चे ? वे तो वर्षों पहले पक्षियों की भांति पंख फैलाकर,न जाने कहां उड़ गए । अब मेरा एक नाती है, जिसके माता (पिता का दुर्घटना में देहांत हो गया था । वह मेरे साथ ही रहता है और अभी दस वर्ष का है । वह मुझसे अनेक बार गुहार लगा चुका है कि तुम अब आराम करो और मुझे रिक्सा चलाना सिखला दो ।
परन्तु मैं उस मासूम बच्चे को नरक में कैसे झोंक सकता हूं  ?
बाबा! क्या तुमने अपने बेटे को इस हादसे से अवगत कराया था ?
नाम मत लो उसका मर चुके हैं, वे सब उसके लिए। विवाहोपरांत वह केवल अपने परिवार को पहचानता है ।  सारी जायदाद हथिया लेने के पश्चात् उसने कभी भी मेरी सुध नहीं ली।बेटा  !  मैं अपने कर्त्तव्य व दायित्व से अवगत हूं । आज भी मुझ में अदम्य साहस है । मैं अपराजेय हूं । मुझे किसी से कोई दरकार नहीं । वर्षों तक भरसक प्रयास करने के पश्चात् ही मैं स्वयं को संबंधों की कारा से मुक्त कर पाया हूं ।


(वरिष्ठ लेखिका,हिन्दी अकादमी हरियाणा की पूर्व निदेशक गुडगाँव, हरियाणा, भारत)
drmukta51@gmail.com