• २०८१ श्रावाण ३ बिहीबार

झरना

बसन्त चौधरी

बसन्त चौधरी

निर्झर, निर्मल
कलकल करता
पहाड की तीव्र ढलान पर
बिखेरता पूरी तन्मयता से
जल–निनाद
पेड–पौधां का जीवन–आधार
सृजनकर्ता हरियाली का
वन्य जीवों की
प्यास बुझाता
अनथक पथ पर बढता जाता
एक मसीहा निर्विवाद ।

पत्थर, कंकड
काँटेदार झाडियाँ, जंगल
सबको सिंचित करता जाता
भेद भाव बिन अविरल बहता
बिना किसी संविदा संवाद
पुण्य–परिपथ पर,
ऊबड–खाबड,
टेढी–मेढी पहाडियों पर
अविरल,
आगे बढता जाता
झरना

प्रकृति को सिंचित करता,
तृप्त करता
निकल जाता है
अनजाने गन्तव्य की ओर
बिना प्रतिवाद ।

साभार: अनेक पल और मैं


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(चौधरी विशिष्ट साहित्यकार हैं ।)