• २०७९ असोज १९ बुधबार

दुखों की पोटली

आर. के. पालीवाल

आर. के. पालीवाल

छोटी या बड़ी
दुखों की एक पोटली
रखी है अमूमन हर सिर पर

कोई अपने दुखों की पोटली
रखता है छिपाकर
अपने सीने से लगाकर
नहीं लगने देता उसकी हवा
अपने बहुत करीबी मित्रों को भी

कोई दुखों की पोटली
खोल देता है सरेआम चौराहे पर
पाने के लिए सहानुभूति हर आने जाने वाले की

कुछ ऐसे भी होते हैं जो
अपनाते हैं बुद्ध का मध्यम मार्ग
न सीने से लगाकर रखते हैं दुख और
न खोलते हैं दुखों की पोटली सबके सामने
वे जिक्र करते हैं इसका बहुत करीबी लोगों से
जिन्हें हमदर्दी होती है और जिन पर विश्वास होता है
कि वे नहीं बनाएंगे मजाक हमारे दुखों का
नहीं उठाएंगे लाभ हमारे दुखों से
कोशिश करेंगे हमारे दुखों के सम्यक समाधान की !

बहुत कम होते हैं स्थितप्रज्ञ
जिनके लिए मिट जाता है अंतर
सुख और दुख का
वही हैं ऊंचाई प्राप्त किए महानुभाव
वही बनते हैं हमारी विभूति समय के साथ !
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(गांधी विचार में निरन्तर लेखन । दो उपन्यास, पांच कहानी और व्यंग संग्रह,एक कविता संग्रह, दो नाटक प्रकाशित, हैदरावाद)
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