गजल– मैथिली - Aksharang
  • २०७८ कातिर्क १० बुधबार

गजल– मैथिली

विन्देश्वर ठाकुर

विन्देश्वर ठाकुर

ओकर देल चोट अइ तरहे प्रहार भेलै
झडि़ गेलै जिनगी,अस्तित्व तार तार भेलै

हृदय मैदानमे बझलै नेहक हथियार संग
ने जीत भेलै ने हार भेलै जिनगी बेकार भेलै

भुखमरी पसरि गेलै हमर मोनक गाममे
बुझू अइ तरहे जेना लोक बेरोजगार भेलै

अहिना पिसाइत रहलौ जनते सन सब दिन
करबै की निकम्मे जऽ दिलके सरकार भेलै

टभकैत रहतै जिनगीभरि पकलहबा घाह जकाँ
मुदा उपाए की तीर जखन देह आरपार भेलै
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योगियारा धनुषा, नेपाल/वर्तमान : कतार
अन्तर्राष्ट्रीय नेपाली साहित्य समाज, कतार चैप्टर सदस्य
bindeshwarthakur@yahoo.com