• २०७९ असोज १९ बुधबार

‘मौत की गोद मिल रही हो अगर, जागे रहने की क्या जरुरत है ।’ दर्द की खुद एक दास्ताँ थी मीना कुमारी

 डॉ. श्वेता दीप्ति

डॉ. श्वेता दीप्ति

आगाज तो होता है अंजाम नहीं होता
जब मेरी कहानी में वो नाम नहीं होता
जब जुल्फ की कालक में घुल जाए कोई राही
बदनाम सही लेकिन गुमनाम नहीं होता
हँस हँस के जवाँ दिल के हम क्यूँ न चुनें टुकड़े
हर शखूस की किस्मत में इनआम नहीं होता
दिल तोड़ दिया उस ने ये कह के निगाहों से
पत्थर से जो टकराए वो जाम नहीं होता…….
मीना कुमारी
बंबई की एक चॉल में उनकी मां इकÞबाल बानो और पिता मास्टर अली बख्Þश रहते थे । थियेटर आर्टिस्ट थे । पिता थियेटर में हार्मोनियम भी बजाते थे । बहुत तंगहाली थी । फिर १ अगस्त १९३२ को उनके घर मीना जन्मीं । घर में दो बेटियां पहले से थीं इसलिए उनके पैदा होने पर कोई खुशी मनाने की संभावना नहीं थी । डिलीवरी करने वाले डॉक्टर को फीस देने तक के पैसे नहीं थे । बताया जाता है कि अली बख्Þश इतने निराश थे कि बच्ची को दादर के पास एक मुस्लिम अनाथालय के बाहर छोड़ दिया । लेकिन कुछ दूर गए थे कि बच्ची की चीखों ने उन्हें तोड़ दिया । वे लौटे और गोद में उठा लिया । बच्ची के शरीर पर लाल चींटियां चिपकी हुई थीं । उन्होंने उसे साफ किया और घर ले आए ।
वैसे मीना उनका असली नाम नहीं था । उनका नाम था महजबीन बानो । उनका नाम बदला प्रोड्यूसर विजय भट्ट ने । दरअसल घर के हालात ठीक नहीं थे और फिल्मों में बच्चों को रोल मिला करते थे । तो उनकी मां इकÞबाल बानो बेटियों के लिए रोल ढूंढ़ा करती थीं । एक बार वे ७ साल की मीना को भी एक फिल्म स्टूडियो लेकर गईं जहां तब के बड़े प्रोड्यूसर विजय भट्ट बैठे थे । उन्होंने कहा कि इस बच्ची के लायक काम हो तो दीजिए । महजबीन का चेहरा उन्हें पसंद आ गया । उन्होंने फिल्म ‘लेदरफेस’ (१९३९) में बाल भूमिका में उन्हें ले लिया । बाद में विजय ने कहा कि अभी फिल्में वो लगातार कर रही है तो ये नाम ठीक नहीं, कुछ और रखते हैं । तो बात करके उन्होंने नाम बेबी मीना कर दिया । फिर बड़ी होकर वे मीना कुमारी कहलाईं । ९० फिल्मों में अपनी दमदार अदाकारी से सिनेमा में अपना लोहा मनवाने वाली मीना कुमारी को इंडस्ट्री में ट्रेजेडी क्वीन के नाम से हर कोई जानता है । लेकिन उनकी दमदार अदाकारी ने बॉलीवुड में उन्हें नया नाम भी दिया था वो था– फीमेल गुरु दत्त ।
मीना कुमारी को नाम, इज्जत, शोहरत, काबिलीयत, रुपया, पैसा सभी कुछ मिला पर सच्चा प्यार नहीं । मीना कुमारी ने अपनी खूबसूरती से करोड़ों लोगों को अपना दीवाना बनाया । बला की खूबसूरत मीना कुमारी के साथ हर कलाकार काम करना चाहता था । इतना ही नहीं उनके ऐसे कई दीवाने भी थे जो उनके इश्क में पागल थे ।
मीना कुमारी इतनी खूबसूरत थीं कि कई एक्टर्स उनके प्यार में पागल हो गए थे । आलम तो ये था कि अपने जमाने के सुपरस्टार रहे राजकुमार, सेट पर मीना डायलॉग्स बोलती, या एक्टिंग करती, तो राजकुमार एकटक उन्हें देखते, और कई बार अपने डायलॉग्स ही भूल जाते थे ।
गुरुदत्त की फिल्म साहिब, बीवी और गुलाम की छोटी बहू परदे से उतरकर मीना की असली जिंदगी में समा गई थी । मीना कुमारी पहली तारिका थीं, जिन्होंने बॉलीवुड में पराए मर्दों के बीच बैठकर शराब के प्याले पर प्याले खाली किए । धर्मेन्द्र की बेवफाई ने मीना को अकेले में भी पीने पर मजबूर किया । वे छोटी–छोटी बोतलों में देसी–विदेशी शराब भरकर पर्स में रखने लगीं । जब मौका मिला एक शीशी गटक ली ।
दादा मुनि अशोक कुमार, मीना कुमारी के साथ अनेक फिल्में कर चुके थे । एक कलाकार का इस तरह से सरे आम मौत को गले लगाना उन्हें रास नहीं आया । वे होमियोपैथी की छोटी गोलियाँ लेकर इलाज के लिए आगे आए । लेकिन जब मीना का यह जवाब सुना ‘दवा खाकर भी मैं जीऊँगी नहीं, यह जानती हूँ मैं । इसलिए कुछ तम्बाकू खा लेने दो । शराब के कुछ घूँट गले के नीचे उतर जाने दो’ तो वे भीतर तक काँप गए ।
आखिर १९५६ में मुहूर्त से शुरू हुई पाकीजा ४ फरवरी १९७२ को रिलीज हुई और ३१ मार्च १९७२ को मीना चल बसी । तमाम बंधनों को पीछे छोड़ तनहा चल दी बादलों के पार अपने सच्चे प्रेमी की तलाश में । मीना कुमारी महज ३९ साल की उम्र में मतलबी दुनिया को अलविदा कह गई । मौत को पहले ही मीना शायद अपना चुकी थी इसी लिए उन्होनें अपनी शायरी में ये कहा था..
‘कोई चाहत है न जरूरत है
मौत क्या इतनी खूबसूरत है
मौत की गोद मिल रही हो अगर
जागे रहने की क्या जरुरत है ।’
पाकीजा सुपरहिट रही । अमर हो गए कमाल अमरोही । अमर हो गईं ट्रेजेडी क्वीन मीना कुमारी । मगर अस्पताल का अंतिम बिल चुकाने लायक भी पैसे नहीं थे उस तनहा तारिका के पास । उस अस्पताल का बिल अदा किया वहाँ के एक डॉक्टर ने, जो मीना का जबरदस्त प्रशंसक था ।
एक तनहा सितारा टूटा और अनन्त में विलीन हो गया
चाँद तन्हा है आसमाँ तन्हा,
दिल मिला है कहाँ कहाँ तन्हा
बुझ गई आस, छुप गया तारा,
थरथराता रहा धुआँ तन्हा
जिन्दगी क्या इसी को कहते हैं,
जिस्म तन्हा है और जाँ तन्हा
हमसफÞर कोई गर मिले भी कभी,
दोनों चलते रहें कहाँ तन्हा
जलती बुझती सी रोशनी के परे,
सिमटा सिमटा सा एक मकाँ तन्हा
राह देखा करेगा सदियों तक
छोड़ जाएँगे ये जहाँ तन्हा ।