English Poem
आब घर घर कहाँ अछि
आब घर घर कहाँ अछि
किछु याद बनि रहि गेल अछि
नहि तऽ आब ओ घर रहल
न तऽ आब ओ लोक रहलाह
सभके अप्पन अलग
सुख दुख अछि
पहिने घरके हर सदस्य
सभ बात एक दोसर सँ
बाँटैत छल
आब अपने अपने राग अलापैत अछि
आब घर घर कहाँ अछि ।
धियापुताके अलगे रंग रहैत छल
खिस्सा पिहानी चलैत छल
आँखिमे राइतके इन्तजार रहैत छल
सुतैत काल खिस्सा सुनवाक चाह रहैत छल
आबक धियापुता मोबाइल चलाबैत अछि
आब घर घर कहाँ अछि
धियापुताके बात छोडि़ दियौक
हमहुँ अहाँ कोनो कम छी
पूरा दिन दोसर सँ बतियात छी
अप्पने अप्पनेमे मग्न रहैत छी
दोसरके बात बुझैत छी
आ अप्पन बातमे अबुझ बनैत छी
आब हर संबंध आधुनिकता देखाबैत अछि
आब घर घर कहाँ अछि
विचार करियो तऽ पहिने किछ
पर्सनल होइत छल ?
धियापुता आ माएके बीच
आ माँ बाबूजीके बीच इ
शब्द छल ? नहि न
मुदा आब अछि ।
आब सभ एक दोसरके बातके
बुझतहुँ अनठाबैत अछि
आब घर घर कहाँ अछि ।
(उप प्राध्यापक,रेडियो कार्यक्रम निर्माता, प्रस्तोता एवं पटकथा लेखन)