• २०८३ कार्तिक ९, आईतवार

पूजा अग्निहोत्री की चार कविताएँ

पूजा अग्निहोत्री

पूजा अग्निहोत्री

१. बेटी नहीं चिराग हूँ

मैं बेटी नहीं चिराग हूँ
बस एक बार तो रौशन होने दो ।
अभी छुपी हूँ कोख में तेरी
मत स्वाद श्वान का बनने दो
कुछ अश्रु चक्षु से पृथक करो
वो तेल के जैसे मुझको जीवन देदेंगी
दीपक की लौ हूँ, प्यारी मैया मुझे जलने दो
मैं बेटी नहीं चिराग हूँ
बस एक बार तो रौशन होने दो ।

अभी पल रही हूँ सीप में मोती सी
आँचल से मुझे छुपा लो तुम
मैं छोटा सा दिया दीवाली का
जगमग जग कर दूंगी तेरा
नन्हे पैरों से थोड़ा बलखाकर चलने दो ।
मैं बेटी नहीं चिराग हूँ
बस एक बार तो रौशन होने दो ।

अभी बीज हूँ बड़े वृक्ष का
छोटी किरण आस की हूँ
कल को पूरा सूर्य बनूँगी
पूरा जग उजला कर दूंगी,
अभी ममता की निर्मल छाँव में पलने दो ।
मैं बेटी नहीं चिराग हूँ
बस एक बार तो रौशन होने दो ।

अभी हूँ झोंका मंद पवन का
कल को सुरभित प्रवात बनूँगी
तूफान नहीं मैं, हूँ सारंगा तेरी
बस अपने तन में रखकर के
मेरी प्राणवायु का क्षीण-स्वर चलने दो ।
मैं बेटी नहीं चिराग हूँ
बस एक बार तो रौशन होने दो ।

२. “आँसू”

इंसान के सबसे सच्चे साथी,
बड़े अजीब होते हैं ये आँसू,
जिंदगी की हर शै में समाये हुये,
कभी गम में भी अकेला नहीं छोड़ते,
खुशी में भी चले आते हैं, दौड़ते।
बचपन में जिद के होते थे
मम्मी पापा इनको साथ देखकर
जल्दी ही मान जाते थे,
न माने तो दादी, उनके लिये तो
ब्रम्हास्त्र थे मेरी नयनबिंदु,
कई बार उड़ेला गया वात्सल्य सिंधु ।

ससुराल में, मेरे आँसू बने
विजय मुस्कान का कारण,
कभी सासूमाँ की, कभी ननद जेठानी की ।
और कभी कभी प्राणेश्वर के अहं को करते तुष्ट ।
और मेरे अबला एकल होने के वहम को करते पुष्ट ।
पर एक सच्चे साथी रहे हमेशा,
यदि स्त्री के पास आँसू न हों तो,
तो वो हो भावशून्य,
मणिहीन सर्प सा हो उसका अस्तित्व
स्त्री संपूर्णता के कारक, आँसू और ममत्व ।

३ . तेरे अंगना में बिखर जाऊँगी

जब घोर तमस हो
पूनम भी जब दिखे अमावस
तब चुपके से आऊूँगी
कभी अँचरा में तारे लेकर
कभी अरुण की रश्मि
भरके अंक में
तेरी अँगनाई में
बिखर जाऊँगी ।

ले अँजुरी भर फूल महकते
तुम्हारी उर वीथियों में
रच जाऊँगी।
झरने की मधुरम
कलकल संग
सुर नित-नित नूतन
रच जाऊँगी ।
विरह तमस में
जब डूबोगे, सुनो प्रियतम
मैं दीप ज्योति बन
फिर पास तुम्हारे आऊँगी ।
जब दग्ध हृदय
विच्छेद जिगर
उफनाते जज्बात हों
तब गोद में मस्तक लेकर
एक मोहर प्रेम की दे जाऊँगी

जब अंतर में विवाद हो
थोड़ा सा प्रतिवाद हो
कोई न हो स्वजन
तब मैं मनकुंजन
बनके लता लहराऊँगी

कभी अरुण की रश्मि
भरके अंक में
तेरी अँगनाई में
बिखर जाऊँगी ।

४ . क्योंकि तुम पुरुष हो

अंजान स्त्री को अपलक
कुछ पल निहार नहीं सकते
उसकी बिना अनुमति दे भी
अपने विचार नहीं सकते
क्योंकि तुम पुरुष हो !!!!

कितने भी दुखी हो लेकिन
किसी भी नर न नारी को
दिखा अपने आँसुओं की
क्षीण सी, धार नहीं सकते
क्योंकि तुम पुरुष हो !!!!

किसी भी कर,
अगले ही पल हिकारत भरी नज़रों का बन जाते हो शिकार ।
कोई सरोकार नहीं किसी को तुम्हारे नज़रिये से,
कोई नहीं पूछता तुमसे तुम्हारे मन के विचार ।
क्योंकि पुरुष हो तुम ।

नहीं पुरुष होना आसान होता है !
तुम पुरुष हो,रो कैसे सकते हो
तुम पुरुष हो तुम सब झेल सकते हो !
बचपन से उसे ये सुनना पड़ता है
कोमल मन को भी
पाषाण बनाना पड़ता है
नहीं पुरुष होना आसान होता है !
सब बातों की जिम्मेवारी
कंधो पर आ जाती है
मुश्किल हालातों में भी
मुस्कुराता रहता है क्योंकि,
रोते नहीं पुरुष
वो खुद को ये समझाता है!
नहीं पुरुष होना आसान होता है !

माँ, बाप,घर,परिवार
सबके लिए जीता है
उनकी ख़्वाहिशों की खातिर
अपने को वो भूलता है
सबके नाज़ों नख़रे वो सहता है
नहीं पुरुष होना आसान होता है !

बच्चे उनके उनसे बेहतर जीए
पत्नी की मुस्कान न हो कम
माँ बाप की उम्मीदों पे हो खरा
न हों रिश्तेदार ख़फ़ा
सबका हिसाब उसे रखना पड़ता है
नहीं पुरुष होना आसान होता है !

स्त्री जीवन गर है मुश्किल
तो पुरुष का जीवन भी
आसान कहाँ होता है ?
अपवादों की बातें छोड़ो
अपवाद कहाँ नहीं होता  ?
नहीं, पुरुष होना भी
आसान होता है !!!!


पूजा अग्निहोत्री, छतरपुर (मध्यप्रदेश) भारत