• २०८३ आश्विन ३०, शुक्रबार

बोखार

प्रेम बिदेह

प्रेम बिदेह

‘‘हँ, लीअ अपन पुरजा । ई दबाइसब खाउ आ पी.सी.आर. कराके आउ !’’ हमरा निर्देशन दैत कम्पाउण्डर पुरजा थमा देलक ।
पी.सी.आर. ? पी.सी.आर. किएक ? हमर जी उडि़ गेल- हमरा कोरोना त नइँ भ’ गेल !
‘‘हमरा डाक्टर साहेबस’ भेंट करा दीअ ।’’ कम्पाउण्डरके अनुरोध कइलिऐ ।
‘‘कथी ला भेंट करबै ? की कहबै अहाँ डाक्टर साहेबके ?’’ कम्पाउण्डरक प्रश्न छल ।’’
‘‘दुइए मिनट बतिआएब हम ।’’ हमर जबाव छल ।
‘‘ठीक छै । भीड़ कम होब’ दिऔ । बैसू ताबत ।’’ ओ आदेश देलक ।
देबालदिस राखल बेञ्चपर बैसि गेलौं हम । पुरजा देखए लगलौं । ‘रिपोर्ट’ ठीकठाक छल- शोणित आ पेसाबक सब जाँच परिणाम सामान्य । फेर टाइफाइडक शंका छल से दूर भेल ।
चारि मास पहिने टाइफाइड भेल छल । पन्द्रह दिनधरि तबाह भेल रही । बोखार चढ़ए–उतरए, चढ़ए-उतरए । ईहे डाक्टर साहेब चौदहटा सुइया लिखने रहथिन । अन्तिम सुइया पड़ल दिन सेहो बोखार चढि़ गेल रहए त डेरा गेल रही- ‘ई जरुर कोरोनाके बोखार अछि तएँ नइँ छूटि रहल अछि !’ मुदा ओही राति बोखार उतरि गेल रहए । तीन दिनसँ फेर बोखार चढ़-उतर होइत अछि । दोकानक एच.ए. के देलहा दवाइ काज नइँ क’ रहल अछि । तएँ पुनः एतए जँचएलौं अछि ।
कम्पाउण्डर हमर नाम चिचिआएल त भक टूटल । चिकित्सक-कक्षमे प्रवेश कएलौं । दूटा रोगीक बाद ओ हमर पुरजा देख’ लगलाह ।
‘‘रिपोर्ट त ठीके हओ । ई दवाइसब शुरु करह ।’’
‘‘सर, दवाइ बेसी कड़ा त नइँ लीख देलिअ ?
‘‘बहुत हल्लुक दवाइ लीख देलिओह । कोनो चिन्ता नइँ करह ।’’
‘‘पी.सी.आर. किए लीख देलौंहँ ? ‘‘हम पुछलिएनि-‘‘हमरा त कोनो लक्षणे नइँ अछि । स्वादो ठीक, गन्धो ठीक । हम साँसो तीस सेकेण्डतक रोकि सकैछी ।’’
‘‘तैयो जाँच करबा ला न ।’’ ओ जबाव देलनि- ‘‘कहीं ‘प्राइमरी स्टेज’ मे होतो ।’’
हम भारी मनसँ बाहर भेलौं । नीच्चा उतरिक’ दोकानमे दबाइ लेलौं आ रिक्सा पकडि़ डेरा आबि गेलौं ।
कनिञा बजारदिस गेल छलीह । झोलफोल भेलापर अएलीह । हमरा बिछाओनपर पड़ल देखि प्रश्न कएलनि- ‘‘की कहलनि डाक्टर साहेब ?’’
टाइफाइड नइँ छै । तैयो तीन रङके दवाइ लीख देलखिनहँ । पाँच दिन खाएके छै । ‘‘हम रोगिआएल बोली बजलौं ।
‘‘त मुँह लटकौने छी कथी लए ?’’
‘‘पी.सी.आर. जाँच सेहो …’’
कनिञाक मुँह एकबेर मुरझाएल । फेर ओ सम्हारि क’ बजलीह- ‘‘नइँ लीअ ‘टेन्सन’ । अहाँ एत्ते संजमस’ रहैछी । अहाँके ‘ऊ’ नइँ भ’ सकैए । …जे दवाइ देलक अइ से खाउ कलेबले । समाचार सुनू , फेसबूक चलाउ । दिमागस’ हटा दीअ कोरोना-तोरोना ।
कनिञाक कहब उचिते लागल । नित्य व्यायाम, गरम पानि, काढ़ा, कागती, दूध–हरदिक सेवन । साबून, हैन्ड वाश, सेनिटाइजरक प्रयोग । कतहु निकलैत छी त मास्के लगाक’ । बाहर खएबो-पीबो नइँ करैत छी । बजारसँ जे पाइ फिरता अबैत अछि ओहुके साफ क’ लैत छी । …बोखारो बेसी नइँ रहैत अछि । सयसँ नीच्चे घुरिआइत अछि । नइँ सर्दी, नइँ खोँखी, नइँ मथदुखी । जलपान–भोजन करैत छी निकेजका ।… नइँ, हमरा नइँ भ’ सकैत अछि कोरोना !
फेर कनी देर बाद शंका उत्पन्न भ’ गेल । बजार जाइत छी । विद्यालय जाइछी । बहुतोके नजदीक जाए पड़ैत अछि । कतेको परिचितस’ बतिआइत छी चौकपर । ककरा की भेल छै, के जानए ? भाइरस कहाँदन एतेक मेंही होइछ जे मास्कोक भुँड़बाटे पैसि सकैत अछि ! तएँ, जँचाइए लेनाइ ठीक । अच्छा, कमसँकम तीन दिन दवाइ खा लैत छी । बोखार ठीक भ’ जाएत त जँचा लेब ।
तीन दिनमे बोखारमे सुधार नइँ भ’ सकल । तखन ‘पैथोलोजी–रिपोर्ट’ पर सन्देह उत्पन्न भ’ गेल । बहुतो बेर कोनो ल्याबक सही परिणाम अबैत अछि त कहियोकाल गड़बड़ो भ’ सकैछ ने । मशीने त छै । दोसर ‘ल्याब’ मे जा क’ रक्त–परीक्षण करएलौं । किछु नइँ देखाएल । टाइफाइडक हिसाबेँ आब निश्चिन्त भ’ गेलौं ।
मुदा पाँच दिन दवाइ खएलाबादो बोखार नइँ उतरल त भय आ शंका बढि़ गेल । कनिञा, धीयापुता आ साथीसङे बतिएलौं । सभक जँचाबहीक सलाह भेटल ।
दोसर दिन प्रदेशक जनस्वास्थ्य प्रयोगशाला पहुँचलौं । व्यक्तिगत विवरण फारम भराओल गेल । एक घण्टाबाद स्वास्थ्यकर्मी हमर नाक आ मुँहस’ ‘स्वाब’ निकालि राखि लेलनि ।
‘‘रिपोर्ट कहिया भेटत ?’’
‘‘काल्हि अहाँके मोबाइलेमे ‘मैसेज’ पहुँच जाएत ।’’
डेरामे आबि चित्ते पडि़ रहलौं । आँखिक आगू एकटा चित्र घूमए लागल । साइरन बजबैत एम्बुलेन्स हमर डेरालग अबैछ । पुलिस हमरा तैयार होब’ कहैत अछि । हम अपन नित्य प्रयोगक सामग्रीसब बैगमे राखि विदा होइत छी । नोराएले नयन परिवारदिस एना तकैत छी जेना आब भेंट नै भ’ सकब । गाड़ीमे बैसिक’ ‘आइसोलेसन’ पहुँच जाइछी । ओतए खानपान समयपर नइँ भेटैछ । गरमो पानिपर आफद छै । कोनो डाक्टर घुरियो क’ हमरालग नइँ अबैत अछि । हम कष्टे–कष्टक सामना करैत छी । बेहोस भ’ जाइछी । सैनिकसभ प्लाष्टीस’ बान्हि–छान्हिक’ हमरा गाड़ीमे ध’क’ ल’ जाइत अछि !
धत् ! कीसब सोचा गेल अछि ! शुरुमे ओहन बात रहै ने । आब त स्वास्थ्य–मापदण्डक पालन करैत ‘होम आइसोलेसन’ माने घरेमे रहि सकैछी । गम्भीर अवस्थामे मात्र अस्पताल जाए पड़ैत अछि । एहन सरकारी निर्देशन अछि । …यदि साबीत भइए गेल त उपरका कोठलीमे रहब बीस–बाइस दिन असगरे । दैनिक प्रयोगक सामानसब उपरे ल’ जाएब । अपन थारी–लोटा अलगे राखब । कनिञा भोजन पहुँचा देती दूरेसँ । एको-दू वेर पत्नी आ सन्तानक झलक देखि लेब त सान्त्वना भेटि जाएत ।
ओह ! विचित्र अछि हमरो दिमाग ! रिपोर्ट आएले नहि अछि आ बौआइत–ढहनाइत अछि हमर मन !
‘‘खालि चिन्तामे डूबल रहैछी– बिमार छी ! बिमार छी !’’ कनिञा हमर मानसिक अवस्थाके अन्दाज करैत निर्देशन देलनि- ‘‘गीतोनाद सुनू न , भीडीयो देखू न, फेसबूक चलाउ न ।’’
तखन मोबाइल हाथमे उठएलौं । ‘वाइफाइ’ खोलि क’ फेसबूक चलाब’ लगलौं ।
प्रातभेने कनिञा हमर देह ठण्ढा रहल बतौलनि । तैयो ‘डिजिटल थर्मामिटर’ लगएलौं । फेर साढेÞ निनानबे डिग्री ! आब अन्दाज भ’ गेल जे रिपोर्ट ‘पोजेटिवे’ आएत । मन विचलित भ’ गेल । अचानक थर्मोमिटरपर सन्देह भेल । दोसर थर्मामिटर काँखतर धएलौं । ओहिमे पारा सनतानबेपर छल । हम असमंजसमे फँसि गेलौं । तकर बाद दूगोट दवाइ–दोकानमे जाक’ तापव्रmम जाँच करएलौं । दुनू ठाम ठहरल सनतानबे ! मन खनहन भ’ गेल । मुदा अपन ‘डिजिटल थर्मामिटरपर’ पीत्त लहरि गेल । घरमे आबिक’ ओहि धोखेबाज थर्मोमिटरके कचराक डिब्बामे फेकि देलिऐ !
ओही दिन दुपहरियामे मोबाइलमे प्रयोगशालाक ‘मैसेज’ आएल । छाती धड़कए लागल । हलचल मचि गेल अन्तरमे । पोजेटिब कि नेगेटिब ? पोजेटिव कि नेगेटिव ? वेभसाइटक लिङ्क खोललौं । हमर जाँचक परिणाम लीखल छल- नेगेटिव ! खुसीसँ मन गदगद भ’गेल । भानसघरमे झटकारैत गेलौं । कनिञाके भरि पाँजा पकडि़क’ हँसए लगलौं ।।।


प्रेम बिदेह