• २०८३ बैशाख २८, सोमबार

फूल बेचती लड़की

आरसी चौहान

आरसी चौहान

फूल बेचती लड़की
पता नहीं कब फूल की तरह
खिल गई
फूल ख़रीदने वाले
अब उसे दोहरी नज़र से देखते हैं
और पूछते हैं
बहुत देर तक
हर फूल की विशेषता

महसूसते हैं
उसके भीतर तक
सभी फूलों की ख़ूबसूरती
सभी फूलों की महक
सभी फूलों की कोमलता
सिर से पाँव तक
उसके एक- एक अंग की
एक- एक फूल से करते हैं मिलान

अब तो कुछ लोग
उससे कभी- कभी
पूरे फूल की क़ीमत पूछ लेते हैं
देह की भाषा में
जबकि उसके उदास चेहरे में
किसी फूल के मुरझाने की कल्पना कर
निकालते हैं कई- कई अर्थ
और उसे फूलों की रानी
बनाने की करते हैं घोषणाएँ
काश ! वो श्रम को श्रम ही रहने देते ।


आरसी चौहान