• २०८१ असार ३२ सोमबार

मैं और मेरी आत्मा

बसन्त चौधरी

बसन्त चौधरी

मैं और मेरी आत्मा
उलझ रहे हैं
एक दुसरे से
सुलझाने के लिए
हमारे मतभेद
जो परेशान कर रहे हैं
मुझे अधिक और
कुछ हद तक
आत्मा को

किन्तु
आत्मा को कष्ट या परेशानी
कैसे हो सकती है ?
वह तो अजर है अमर है
और
जन्म–मरण से परे
फिर उसे द्वन्द्व कैसा
और कष्ट भी कैसा ?
अविनाशी आत्मा को
हम दौड रहे हैं
वह मुझसे आगे
जा रही है
या मैं उससे आगे
समझ से परे है
पर
जब मैं असहज होता हूँ
तो वह मूँग दलने लगती है
मेरे सीने पर और
जब मैं सहज होता हूँ तो
साँप लोटने लगते हैं
उसके सीने पर

शायद
यह द्वन्द्व ले जा रहा है
मुझे शून्य की ओर
पर
उस निर्लिप्त आत्मा को नहीं ।

साभार: अनेक पल और मैं


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(चौधरी विशिष्ट साहित्यकार हैं ।)