• २०८१ असार २ शनिवार

तुझ में

बसन्त चौधरी

बसन्त चौधरी

बढ रहा हूँ
नियति द्वारा निर्धारित दिशा में
जंगल, पहाड, बियाबान
ऊबड–खाबड, पथरीली राहों पर
बढा जा रहा हूँ
बिना रूके, बिना थके
निरन्तर अपने लक्ष्य की ओर
अद्भुत गन्ध की ओर ।

कल–कल करते झरनों का निनाद
किनारों से टकराती
वेगवती नदिया की धार
आकर्षित करती पुष्पों की वादियाँ
और
उन पर मँडराते तितली और
भ्रमरों का सम्मोहक गुंजन
पर नहीं है यहाँ वह
जिसकी है मुझे चाह
भीनी–भीनी मुग्ध
कर देने वाली सुगन्ध

चाह नहीं है मुझे
चमत्कारी प्रकाश की,
या किसी के मार्गदर्शन की,
रोक नहीं पा रहा है मुझे
पहरे पर फैला अन्धकार भी
मुझे ज्ञात है, पहचान भी है
उस आत्मीय अप्रतिम सौन्दर्य की

और
अन्ततः पा लेता हूँ मैं
उस बेहद निजी
अव्यक्त अहसास की अनुभूति को
हाँ! हाँ!!
उसी जीवनदायिनी
श्वाँसों में महकती
आह्लादित कर देने वाली
आलिंगन गन्ध या सुगन्ध को
और खो जाता है मेरा तन–मन
कहीं मेरे अतीत में
या तुझ में !!

साभार: अनेक पल और मैं


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(चौधरी विशिष्ट साहित्यकार हैं ।)