• २०८१ असार १२ मङ्गलबार

इक रात खुशहाल सी

प्रियांशी

प्रियांशी

इक रात खुशहाल-सी
जब मम्मी- पापा से छुपकर
फ्रिज से चाॅकलेट चुराकर
आनंद लेते छुप- छुप खा जाते हैं

इक रात खुशहाल-सी
जब खिड़की के गमलों से
आती फूलते फूलों की महक
नींद सॅंवार जाती है

इक रात खुशहाल सी
जब रात भर जगकर
पढ़- लिख अभ्यास कर
तन – मन तृप्त होता है

इक रात खुशहाल सी
जब कामयाबी पाकर
सफल-सफलतम जीवन के
ख्वाब देखते सो जाते हैं

इक रात खुशहाल सी
कि मौन दुनिया में जगकर
इक दर्द भरी शायरी सुनकर
चुपके से आंख लग जाती हैं

इक रात खुशहाल सी
माँ संग हॅंस-खेलकर
माँ के गले लगकर
बुरे सपनों से बच जाते हैं

इक रात खुशहाल सी
जब आईने में देखकर
खुद से बतियाकर
कल के लक्ष्य को गिनते हैं

इक रात खुशहाल सी
खिड़की से झाॅंककर
जुगनुओं से बात कर
चाॅंदनी में खो जाते हैं

इक रात खुशहाल सी
चाॅंद को मुस्कुराते देखकर
खुद उल्लसित होते
बचपन से अब तक की सैर कर आते हैं

इक रात खुशहाल सी
जब सारे काम खत्म कर
दफ्तर से थककर आते
और निश्चिन्त हो सो जाते हैं

इक रात खुशहाल सी
जब अपनों को सोता देखकर
मनभर सुकून पाकर
चैन की साॅंस ले पाते हैं

इक रात खुशहाल सी
जब सारे कर्तव्य पूर्ण कर
सदा के लिए आंखें मूंदकर
प्रकृति की गोद में सर रख देते हैं ।


प्रियांशी, मुंबई, भारत