• २०८१ असार ३२ सोमबार

उन जैसी न बहन किसी की

सुषमा दीक्षित शुक्ला

सुषमा दीक्षित शुक्ला

बात उन दिनों की है जब कोरोना का कहर बरस रहा था पूरे विश्व मे हाहाकार मची हुई थी, हर तरफ अनहोनी हो रही थी मृत्यु का भयंकर तांडव मचा हुआ था । उसी समय छः अक्टूबर की शाम में मेरे बेटे कुलदीप को तेज बुखार ने घेर लिया उस वक्त हम लोग बहराइच स्थित अपने घर पर थे ,प्राइवेट डॉक्टर्स भी मरीज को देखने से कतरा रहे थे सरकारी अस्पतालों में कोरोना के डर से जाना दूभर था कि कोरोना इन्फेक्शन हो जाएगा, बेटे की हालत बहुत खराब थी मैंने लखनऊ में रहने वाली अपनी जिज्जी व भांजी को फोन कर बेटे के हाल से अवगत कराया, मेरी दीदी दिल की मरीज होने के बाबजूद काफी हिम्मती थीं बहादुर व सहृदय भी । दयालुता व प्यार का प्रतिरूप थीं वह । उन्होंने मुझे फोन से काफी तसल्ली दी व हिम्मत बंधवाई कि लखनऊ लेकर किसी तरह चली आओ भैया ठीक हो जाएगा ।

मेरे बेटे के पूरे लक्षण कोरोना के थे बेटे की स्थिति लगातार गिरती जा रही थी इतना बीमार वह पहले कभी नही हुआ था बेहोशी सी हो रही थी उसे ।दीदी के दामाद ने मित्र डॉक्टर से रात ज्ञ बजे फोन से लक्षणों के आधार पर कुछ दवा लिखवाई डॉक्टर साहब को पूरा शक कोरोना का था किसी तरह दवा मंगाकर देने से हल्की आराम लगी तो सुबह 4 बजे उसे लखनऊ गाडा से लेकर चल दी ।

हम जैसे ही अपने घर पर पहुँचे ही थे कि मेरी 71 वर्षीय जिज्जी जो दिल की बडी मरीज थीं ,जिनको कोरोना का खतरा बहुत ज्यादा था टीका भी नही लगा था ,वह बिना अपनी जान की परवाह किये मास्क लगाकर भगवती दुर्गा की तरह अपने बच्चों के साथ मेरे घर तुरन्त पहुँच गयीं ,यह भी परवाह नही की उनके डॉक्टर ने उन्हें उस समय घर से निकलने से हर हाल में मना किया है एक बार हार्ट अटैक पड चुका था उनको व इसके साथ ही उनके घर पर नन्हे नन्हे उनके नाती पोते थे जिनको भी कोरोना इन्फेक्शन होने का खतरा था । इतनी संवेदनशील परिस्थिति में जब स्वस्थ व जवान लोग क्या अपने क्या पराए सभी एक दूसरे से दूर भाग रहे थे ,उस वक्त मेरी प्यारी जिज्जी ने बुजुर्गियत की अवस्था मे अपनी व अपने परिवार के प्राणों की परवाह न करके मेरा साथ दिया मेरे बच्चे को बचाने के लिए हर सम्भव मदद की ।

मेरे घर पहुँचते ही स्वास्थ्य विभाग में कार्यरत अपने बेटे से मेरे बच्चे की कोरोना की जाँच तुरन्त करवाई भगवान की दया व जिज्जी के आशीर्वाद से जाँच में कोरोना की पुष्टि नही हुई डेंगू साबित हुआ ,तब कोरोना का भय दूर हुआ । फिर उन्होंने डॉक्टर को दिखवाया व मेरा बेटा दीदी के आशीर्वाद से उनके स्नेह व सानिध्य से स्वस्थ हो गया । अब तो प्यारी जिज्जी के केवल यादें ही शेष रह गयीं हैं १ कौन करेगा इतना प्यार १ कौन रखेगा इतना खयाल । तभी तो मैंने लिखा था, तुम जैसी ना बहन किसी की इस जग में होती है ।ममता का दरिया है तू तो करुणा की ज्योति है ।


सुषमा दीक्षित शुक्ला, लखनऊ,उ.प्र. – भारत
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