• २०८१ असार १२ मङ्गलबार

संवेदनाएँ

बसन्त चौधरी

बसन्त चौधरी

कँटीली झाडियों में
उगे नुकीले काँटो के
जाने या अनजाने छुअन से
रिसता दर्द
चकमक पत्थरों की रगड से
धूल–धूसरित राहों में
लगी आग से
जलता दर्द
पैरों में चुभते
राह पडे कंकडों से
उपजा दर्द
इनसे ही अक्सर
जन्म लेती हैं या पनपती हैं
संवेदनाएँ ।
कभी–कभी बादलों की
गडगडाहट से
प्यासे खेत की बंजर मिट्टी से
सुख–दुःख में डुबती–तैरती
किसानों की आशा भरी निगाहों से
फिर–फिर जन्म लेती हैं
संवेदनाएँ ।
और कभी भूख से बिलबिलाते
बचपन को जब मिल जाता है
माँ का वात्सल्य भरा आँचल
आँखो में सजते हैं जब
भविष्य के सुनहरे सपने
तब स.वेजेदनाओं की जगह
जाग्रत होती हैं
भविष्य के लिए
असीमित सम्भावनाएँ !!

साभार: अनेक पल और मैं


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(चौधरी विशिष्ट साहित्यकार हैं ।