• २०८० असोज ९ मङ्गलबार

“लोग हैं लागि कवित्त बनावत, मोहि तौ मेरो कवित्त बनावत”- ‘घनानन्द’

श्वेता दीप्ति

श्वेता दीप्ति

विरह हृदय की अनुभूति होती है, जहाँ हृदय की टीस, प्राणों की तड़पन और मन की आकुलता का आधिक्य होता है ।

विरह प्रेम की कसौटी है । जो विरही इस कसौटी पर खरा उतरता है, वही सच्चा प्रेमी माना जाता है, क्योंकि प्रेम का सात्विक रूप विरह है, जबकि संयोग प्रेम का राजस रूप है। संयोग में प्रेमी वासना का शिकार बना रहता है, जबकि वियोग में वह वासना से ऊपर उठकर आध्यात्मिक स्थिति को प्राप्त कर लेता है। वैसे भी संयोग में प्रेम के वास्तविक रूप का पता नहीं चलता, क्योंकि प्रेमियों के हृदय में एक-दूसरे के प्रति कितनी दृढ़ता है, कितनी निष्ठा है, कितनी आतुरता है, कितनी तीव्रता है और कितनी चाह है, इसका ज्ञान विरह में ही होता है। विरह प्रेमी की दृढ़ता का परिचायक होता है; विरह ही उसकी निष्ठा एवं उत्कण्ठा का द्योतक होता है और विरह ही एक प्रेमी की प्रिय के प्रति उत्कट चाह, तीव्र आकांक्षा, सुदृढ़ लालसा एवं उद्दाम आकुलता का ज्ञापक होता है। इसलिए विरह-काव्य सर्वाधिक हृदयद्रावक, चित्ताकर्षक एवं संवेदनात्मक होता है। घनानन्द भी ऐसे ही विरही कवि हैं, जिनके हृदय में अपनी प्रेयसी ‘सुजान’ की उत्कट विरह-भावना भरी हुई है। घनानंद के विरह में हृदय की उद्दाम लालसा एवं उत्कण्ठा का प्राधान्य है, उसमें अनुभूति की तीव्रता है, अन्तःकरण की सात्विक वेदना का आधिक्य है और बाह्य आडम्बर लेशमात्र भी नहीं है।घनानन्द के विरह में सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह एकांगी है। सम नहीं है, अपितु विषम है, क्योंकि जो तड़पन है, चीत्कार है, जलन है, धड़कन है, वह एक ओर ही है केवल प्रेमी का ही हृदय अपने प्रिय (प्रेयसी सुजान) के विरह में रात-दिन तड़पता रहता है, जबकि उनके प्रिय के हृदय में विरह की तनिक भी आग नहीं है, तनिक भी आकुलता-व्याकुलता नहीं है तथा तनिक भी बेचैनी नहीं है ।

घनानंद कविता में निपुण और सिद्ध संगीतकार थे । मुग़ल दरबार में इनका काफी सम्मान बढ़ गया था जिसके कारण अन्य दरबारी इनके विरोधी हो गए थे । वे घनानंद को दरबार से निकलवाना चाहते थे।एक दिन दरबारियों ने राजा से कहा- मीर मुंशी बहुत अच्छा गाते हैं । बादशाह ने उन्हें गाने के लिए कहा किन्तु घनानंद बादशाह के बात को टालते रहे। यह देखकर दरबारियों ने बादशाह को बताया कि मीरमुंशी ‘सुजान’ के कहने पर अवश्य गायेंगे । सुजान बादशाह के दरबार में नर्तकी थी । सुजान के कहते ही कवि घनानंद सुजान की ओर मुख और बादशाह की ओर पीठ करके बहुत ही अच्छे सुर में गाना गाने लगे । उनके संगीत को सुनकर बादशाह और सभी दरबारी मन्त्र-मुग्ध हो गए परन्तु पीठ फेर कर गाने की इस बे-अदबी के कारण नाराज होकर बादशाह ने घनानंद को दरबार छोड़ने का आदेश दे दिया । घनानंद ने सुजान को भी अपने साथ चलने के लिए कहा लेकिन नर्तकी सुजान ने घनानंद के इस आग्रह को ठुकरा दिया । सुजान के इस विश्वासघात से घनानंद को बहुत धक्का लगा। इसी गहरे दुःख के कारण वे विरक्त होकर वृन्दावन चले गए। वहीं वे वृन्दावन में निम्बार्क वैष्णव संप्रदाय में दीक्षित हो गए। वृन्दावन जाने के बाद उनके मन को शांति मिली और सुजान का प्रेम, राधा-कृष्ण के प्रेम में परिवर्तित हो गया । और यही उनके कविता का वर्ण्य विषय बना ।

घनानंद के विरह वर्णन की सर्वोपरि विशेषता उसकी सादगी और मार्मिकता है। उसमें अन्य रीतिकालीन कवियों के समान विरह को शब्द जाल का तमाशी नहीं बनाया गया है। प्रथम छंद में कवि ने प्रिय वियोग में व्याकुल एक विरहिणी की दिनचर्या को वर्णन किया है। ‘मोहन, सोहन’ संबोधन से अनुमान होता है कि वह कृष्ण-मिलन को व्याकुल, एक ब्रजबाला का चित्रांकन है। निरंतर वन की ओर ताकना, रातें तारे गिनते ही बिताना, सामने आने पर भी अपने मनभावन को जी भर कर न देख पाना और निरंतर उनकी प्रतीक्षा में आँखें बिछाए रहना आदि चेष्टाएँ वियोग अथा विप्रलंभ श्रृंगार का सर्वांगपूर्ण चित्र प्रस्तुत कर रही हैं। अन्य छन्दों में कवि ने स्वयं को ही रस (वियोग श्रृंगार) का आश्रय बनाया है। सुजान आलम्बन है। कवि की उक्तियाँ अनुभाव हैं, पल-पल बदलती मनोभावनाएँ संचारी भाव हैं ।

घनानन्द के उत्कट विरह का मूल कारण यह है कि उनकी ‘अलबेली सुजान’ अनिन्द्य सुन्दरी थी। उसमें उन्हें अलौकिक सौन्दर्य के दर्शन हुए थे और वे उस सौन्दर्य को नित्य देखते रहना चाहते थे। कारण यह था कि वह रूप उन्हें नित्य नया-नया प्रतीत होता था और उस रूप पर उन्होंने अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया था, परन्तु दुर्भाग्य! वह रूप उनकी आँखों से ओझल हो गया, उन्हें फिर देखने को नहीं मिला और वे अपनी उस पागल रीझ के हाथों बिककर रात-दिन वियोग की आग में जलते रहे-

रावरे रूप की रीति अनूप नयो-नयो ज्यों-ज्यों निहारियै।
त्यौं इन आँखिन बानि अनोखी अघानि कहूँ नहिं आन तिहारियै॥
एक ही जीव हुतौ सु तो वार्यो सुजान सँकोच ओ सोच सहारियै।
रीकी रहै न, वहै घनआनंद बावरी रीझ के हाथनि हारियै ॥

घनानंद का विरह बौद्धिक नहीं है, वह उनके हृदय की सच्ची अनुभूति है और जहाँ विरह बौद्धिक होता है, वहाँ प्रदर्शन एवं आडम्बर का आधिक्य देखा जाता है, किन्तु जहाँ विरह हृदय की अनुभूति होती है, वहाँ प्रदर्शन एवं आडम्बर कहाँ! वहाँ तो हृदय की टीस, प्राणों की तड़पन और मन की आकुलता का आधिक्य होता है और वह टीस, तड़पन एवं आकुलता बाहर नहीं सुनाई पड़ती, क्योंकि हृदय बल नहीं पाता, वह मौन रहकर ही धड़कता रहता है, प्राण कुछ कह नहीं पाते, चुपचाप तड़पते रहते हैं और मन चीत्कार नहीं कर पाता, वह अन्दर ही अन्दर घुटता रहता है और आकुल बना रहता है। यही कारण है कि घनानंद का विरह बाह्य चीत्कार, बाह्य कोलाहल एवं बाह्य शोरगुल से सर्वथा दूर हृदय की मौन पुकार है तथा अन्तःकरण की आन्तरिक जलन है, जिसमें विरही के प्राण तपते रहते हैं, अंग पसीजते रहते हैं और वह जो मसोस-मसोस कर तड़पता रहता है-

अंतर- आँच उसास तजै अति, अंत उसीजै उदेग की आवस।
ज्यौ कहलाय मसोसनि ऊमस क्यों हूँ सुधरैं नहीं थ्यावस॥

घनानंद की कविता का प्राण उनकी प्रेम की विरहानुभूति थी। घनानंद की कविता में प्रेम के पीर की अनेक रूप विधमान हैं। घनानंद के जीवन में प्रेम का स्थान बहुत ही ऊँचा था। उनका सम्पूर्ण जीवन काव्य प्रेम रुपी रस से ओत-प्रोत था। इनका प्रेम सामान्य नहीं उदात्त था। इन्होंने सुजान के पेशे से नहीं, सुजान से प्रेम किया था। घनानंद ने सुजान से नकारात्मक प्रतिक्रिया पाकर भी प्रेम करना नहीं छोड़ा बल्कि उन्होंने सुजान के प्रेम को अपनी रचनाओं में पिरोकर उसे और भी अमर बना दिया। प्रेम के मार्ग में इन्हें जो दुःख और पीड़ा मिली उससे वे निराश नहीं हुए बल्कि और भी उत्साह से प्रेम के पथ पर आगे बढ़ते चले गए। घनानंद ने अपने प्रेम को आध्यात्मिकता की पराकाष्ठा तक पंहुचा दिया। घनानंद ने जिस तरह प्रेम रूपी सागर में डूबकर सुजान से प्रेम किया उसी तरह आध्यात्म रूपी सागर में डूब कर भगवान श्री कृष्ण से भक्ति किया। घनानंद ने प्रेम और भक्ति के बीच की रेखाओं को मिटा दिया। इनका लौकिक प्रेम कब अध्यात्मिक प्रेम में बदल गया यह उन्हें भी नहीं पता चला ।


(डा. श्वेता दीप्ति त्रिभुवन विश्वविद्यालय में हिन्दी साहित्य की उप-प्राध्यापक हैँ)
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