• २०८१ असार ११ सोमबार

धूप-छाँव

बसन्त चौधरी

बसन्त चौधरी

सुख और दुख
जीवन में धूप और छाँव
की तरह ही तो हैं
आते हैं ओर जाते हैं
और फिर छोड जाते हैं
हमारे मानस–पटल पर
अपने असंख्य प्रभाव
कभी देखा है धूप को
कभी सामने, तो कभी पीछे
कभी बायें, कभी दायें
और कभी जब
पूर्ण जवाँ होती है तो
हमारी सिर पर नाचती है ।
पर छाँव कभी नहीं मिलती
उस तप्त रूखी धूप से
पर कायम रहती है
उसके समानान्तर
उसी प्रकार जैसे
सुख–दुख नहीं मिलते
एक दूसरे से
पर साथ होते हैं
हमारी जिन्दगी के

जीवन की गति यही है
और पूर्णता भी इसी से है
जीवन के तत्व
धर्म, धैर्य, साहस और सत्कर्म
ही आधार हैं जो हावी रहते हैं
धूप छाँव या सुख–दुख पर ।

साभार: अनेक पल और मैं


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(चौधरी विशिष्ट साहित्यकार हैं ।)