• २०८१ असार १२ मङ्गलबार

बरसात

सुषमा दीक्षित शुक्ला

सुषमा दीक्षित शुक्ला

सुनु आई बरसात सखि,
लगा हृदय बिच बाण ।
सिर्फ देह है सखि यहाँ ,
प्रियतम ढिंग है प्राण ।।

किसके हित सँवरूं सखी,
किस पर करूं सिंगार।
बाट निहारुं रात दिन,
पिय नहिं सुनत पुकार।।

ऋतु पावस की सुरमई,
पिया मिलन का दौर ।
धानी चूनर खेत में,
बगियन में हैं मोर ।।

यह कैसी बरसात सखि,
जियरा चैन न पाय ।
नैनन से आंसू झरत,
उर बहुतहि अकुलाय ।

पिय कबहूँ तो आयंगे,
वापस घर की राह ।
बाट निहारूँ दिवस निसि,
उर धरि चाह उछाह ।।

सबके प्रियतम संग हैं,
मोरे हैं परदेस ।
जियरा तड़पत रात दिन,
यही हिया में क्लेष ।।

मन मेरो पिय संग है,
भावे नहिं घर–ठौर ।
वह दिन सखि कब आइहैं
पिय धरिहैं जब मौर ।

रात दिवस नित रटत हूँ,
मैं उनही को नाम ।
वो ही मेरे चैन– सुख,
वो ही चारोंधाम ।।

डर लागत है सुनु सखी,
पिय भूले तो नाह ।
हम ही उनकी प्रेयसी,
हम ही उनकी चाह।।

ऋतु बरसाती सुनु ठहर,
जब लौं पिया न होय ।
कोयल पपिहा से कह्ये
शोर करै नहिं कोय ।।


सुषमा दीक्षित शुक्ला
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