• २०८१ असार ११ सोमबार

गली में सन्नाटा है

बसन्त चौधरी

बसन्त चौधरी

गली में सन्नाटा है ।
आदमी खोजने निकला था
सन्नाटा मिल गया ।

मैं निश्चेष्ट सोच रहा हूँ मुझे इस सन्नाटे की क्या जरूरत ?
अभी मैं सांस ले रहा हूँ मैं इस सन्नाटे को नहीं चाहता
मगर दुविधा में हूँ कि इसे हटाऊँ कैसे ?

किसने दिया है यह सन्नाटा
निचोेड रहा है जो मन के कोने–कोने को
सांसे अटक गई हैं
गुमसुम हो गया हूँ कौन उबारेगा मुझे ?
कौन उद्धार करेगा ?
बंद दरवाजे को थपथपाता हूँ मगर जवाब नहीं मिलता ।
मैं सवालों के घेरों में घिर चुका हूँ
मैं खुद को दे रहा हूँ  शुभकामनाएँ
कि जिंदा रह सकूँ साबूत रह सकूँ ।

मैं टुकडों में बट चुका हूँ
चारों तरफ बिखर चुका हूँ
यही है मेरे जिंदा होने का सबूत ।

मैं नहीं जानता कि मैं इतना आकुल क्यों हूँ
क्यों बिच्छिन्न होता जा रहा हूँ
मैं चिल्लाना चाहता हूँ, चीखना चाहता हूँ
मगर आवाज नहीं निकलती, निरूत्तर मैं जवाब ढूँढता हूँ
मगर कहीं से कोई जवाब नहीं मिलता ।
क्योंकि गली में सन्नाटा है ।

साभार: चाहतों के साये में


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(चौधरी विशिष्ट साहित्यकार हैं ।)