• २०८१ बैशाख ८ शनिवार

टूटते पंख

अनिल कुमार मिश्र

अनिल कुमार मिश्र

पक्षी ने
अपने कमजोर होते
टूटते पंख से कहा-
क्या सच मे चले जाओगे
मुझे छोड़कर
तुम्हारे ही बल पर
विश्वास कर
मैंने उड़ने की कोशिशकी
फिर उड़ना भी सीखा
अगर तब चले जाते
तो मैं जी लेता
दूसरे आएँगे
इस विश्वास के साथ
पर आज जब मेरा कुछ भी नहीं
कोई भीन हीं
तेरे ही बल पर जीता हूँ
मिलजाते हैं टुकड़े
उड़ लेता हूँ थोड़ा बहुत
मेरे सब कुछ तुमही हो
हाँ, मेरे रिश्तेदार भी
तुमसे अपना मेरा कौन है
छलोगे नहीं तुम मुझे
यह विश्वास है मेरा
इतने अपने होकर भी
जिसे मैंने अब तक अपनी देह पर धारा

अगर तुम छोड़ जाओगे तो
लोगों का विश्वास
अपनों पर कभी नहीं होगा
कभी भी भरोसा नही कर सकेंगे लोग
अपनो पर
मेरी विनती सुन लो
रुक जाओ हे पाँख
मानव के रक्षार्थ रुक जाओ
समाज के रक्षार्थ रुक जाओ
मत जाओ मुझे छोड़कर
मत जाओ
मत जाओ
मेरे पाँख !


अनिलकुमार मिश्र, राँची, झारखंड, भारत
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