• २०८१ श्रावाण १ मङ्गलबार

ग़ज़ल

डा. साकिब हारूनी

डा. साकिब हारूनी

मुत्ताहिद ज़ात भी नहीं होती
तुम से फिर बात भी नहीं होती

एक ज़माना था रोज़ मिलते थे
अब मुलाक़ात भी नहीं होती

शिद्दत ए प्यास से तड़पते लब
और बरसात भी नहीं होती

दिन तो हंगामा ए जोनूं ठेहरा
पुर सोकूं रात भी नहीं होती

मैं तो मजबूर अपने आप से हूं
तर्क ए हफवात भी नहीं होती

जान लो दोस्ती में ऐ साकिब
हम से यूं घात भी नहीं होती


डा. साकिब हारूनी (काठमाडौँ)
[email protected]