• २०७९ असोज १८ मङ्गलबार

पसीज जाता हूं

नरेश अग्रवाल

नरेश अग्रवाल

मित्रो मुझसे ईष्र्या मत करना कि
मैं फूल ढोने जैसा आसान काम करता हूं

इतना आसान कि
कभी थकने का अवसर ही नहीं मिलता
और इसमें इज्जत भी खूब

खरीददार तक राह देखते रहते हैं मेरी
हाथोंहाथ बिक जाते हैं सारे फूल
धर्मस्थल के आगे सजी दुकानों में

थोड़ी देर बैठकर सुस्ता भी लेता हूं
मुंह भी मीठा कर लेता हूं प्रसाद से

बस वापसी पर यह खाली टोकरी
सूनी-सूनी लगती है
सूना-सूना लगता है यह कंधा

कभी-कभी पसीज जाता हूं भीतर तक
दूसरों के कंधों पर भार लदा देखकर ।


(जमशेदपुर, झारखंड निवासी अग्रवाल का कविताओं पर १० पुस्तकें तथा अन्य विषयों पर ८ पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं ।)
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