प्रेम ही तो है - Aksharang
  • २०७८ मंसिर १३ सोमबार

प्रेम ही तो है

डॉ अनुराधा ‘ओस’

डॉ अनुराधा ‘ओस’

नदी जिस तरह थरथरा कर
हवा जिस तरह लहराकर
बालों में गूँथे फूल
प्रकम्पित होकर
अपने मोबाइल से देता है
सन्देश फूलों को
पहाड़ों को, लाल सूर्य को
तभी तो उगता है प्रेम
हाँ ! उसी की बात कर रही हूँ
वो प्रेम नही तो क्या है ?
जो कठोर शिलाओं के बीच से
निकलती है एक नन्ही कली
चूमना चाहती है
उसी तरह,
जैसे नदी पत्थरों को
जैसे नाव नदी को
लहरें किनारों को
धान की सुनहली बालियां
सूरज की लाली को


(डॉ ओस हिन्दी की चर्चित कवि हैं)
anumoon08@gmail.com