शरद की रात - Aksharang
  • २०७८ असोज १२ मङ्गलबार

शरद की रात

अनिल कुमार मिश्र

अनिल कुमार मिश्र

शरद की रात ठिठुरनेवाली अब तो आने वाली है
जीवन को हँसकर- गाकर समझाने वाली है
प्रीत जगत की रीत युगों से समझो इसको
क्या मंदिर, मस्जिद, गिरजा बताने वाली है ।

लड़कर भिड़कर एक दूजे से मिलना क्या है
नीति बनाकर तरह तरह के छलना क्या है
जन्म लिया था ढाई किलो, राख बचेगी ढाई किलो
सब अपने ही भाई बहन हैं ईष्र्या क्या है ।

रात सुहानी यह पूनम की ठिठुर- ठिठुर हर्षाने वाली
जीवन के मृदु वाद्य तरंगों को है यही लुभानेवाली
हँस लो, गा लो, जी भर जी लो, प्यार बाँटकर
सब हैं तेरे, तुम हो सबके गाने वाली है ।

मिलन- विरह और विरह- मिलन बस यही चक्र है जीवन का
सार शीत का,पूनम का,ऊष्णता सूर्य और चंदा का
रीत जगत् की प्रातः- रात समझाने वाली है
रिश्तों को हँसकर, गाकर, उलझाने वाली है ।

शरद की रात ठिठुरने वाली अब तो आने वाली है
जीवन को हँसकर- गाकर समझाने वाली है
प्रीत जगत् की रीत युगों से, समझो इसको
क्या मंदिर,मस्जिद, गिरजा बताने वाली है ।

शरद की रात ठिठुरनेवाली अब तो आने वाली है
जीवन को हँसकर गाकर बहलाने वाली है ।


(राँची, झारखंड, भारत ।)
itsanil76@gmail.com