• २०७९ असोज १८ मङ्गलबार

छ कविताएं

सोनाली मराठे

सोनाली मराठे

 

एक

एक खयाल
ले जाता है मुझे
उन सफेद बादलों में
जहाँ तुम
ले रही हो गहरी नींद
सफेद रुहानी फूलों की
चादर लपेटे…
मैं आती हूँ तुम्हे मिलने
छूती हूँ तुम्हे खयालों में
सोचती हूँ तुम आँखे
खोलकर देखोगी,
मुस्कुरा ओगी…
मैं तुम्हारे आँचल में
फिर से छिप जाऊंगी
तुम्हारे हसने से
खिल उठेगा
सारा आसमान
फिर मैं ये करूंगी..
मैं वो करूंगी
ना जाने कितनी सारी
बातें,
बचपन से लेकर आजतक…
पता है…अब मैं भी
माँ बन चुकी हूँ
शायद तुम्हे अच्छेसे
समझूंगी…
अब तो आँखे खोलो
माँ …क्या तुम्हे मेरा
इतना भी खयाल नहीं आता….?

दो

मेरे घरमें काम करने के लिए
बाई आती है…
मौसी कहती हूँ मैं
वो जब छुट्टी लेती है,
बिना कुछ जाने
मैं तपाक से कह देती हूँ उन्हे,
पैसे काट लूंगी दो दिन के…
और मैं जब बीमार होती हूँ,
वो प्यार से बोलती है…
बेटा ! तुम खयाल रखा करो अपना
मैं हूँ ना ! सब काम कर दूंगी
सचमुच बहोत छोटी हूँ मैं…

तीन

कोई जल्दी नही है…
कई अड़चने है
खुद को
टटोलना…
दिवानों का काम है
माटी–पानी साथ लिये
आसमान को सवरना है
हौले से…हर बला से
अपने अंदर को
महफूज रखना है…

चार

सब अपने अपने किनारों की
तलाश में…
मैं ऐसी राह पर हूँ
जहाँ हर किसी बात पर
दर्द होता है,
प्रकृति की कराहने पर…
अस्तित्व पर उठनेवाले
सवाल पर
जमीन के अंदर वीज न उगने पर…
किसी अपने की यादभरी
सिसकी पर,
किसी का आसमान टूटने पर…
और एक दिन बीत गया
गिनते हुए उंगली पर,
जली हुई रोटी पर…
बर्तन की खरोच पर
बहोत बहोत मजबूत
होना है…
अपने अंदरुनी हिस्से के लिए…

पाँच

नदी की तरह बहना
चाहती हूँ…
बहते बहते मछलीयों को
चुमना चाहती हूँ…
खुले आकाश के हवाले
होना चाहती हूँ…
मैं चिडीया बनकर तेरे
कंधेपर चहकना
चाहती हूँ…
पेडों के हरे रंगों में
रंगना चाहती हूँ…
मैं मिट्टीमें सांसे सिंचना
चाहती हूँ…
मैं खुशियाँ बिखेरना चाहती हूँ,
बेचैन सपनों के साथ
दम घुटता है अब मेरा…

मैं नदी हो गई हूँ…
बादल के उस पार बहूंगी
खुद को पढते हुए
आगे निकल जाऊंगी
प्यार पुरा संसार है
और बादल पुरा सपना
कुछ भीतर कुछ बाहर
मुस्कुराने की वजह ढुंढूंगी
बहोत दूर तक बहती रहूँगी
इससे बेहतर और कुछ नही


(मराठे स्थापित कवि हैं)
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