• २०७९ असोज १९ बुधबार

एक कवि का जाना

संजय कुमार सिंह

संजय कुमार सिंह

एक कवि का जाना
हजारों सपनों के जाने जैसा है…
यूँ इस साल गए अनगिनत लोग
कुछ दुख देकर, कुछ दुख ढोकर,
कुछ की यादें टीसती हैं अब भी
कुछ के धूमिल पड़ गए हैं चेहरे ।

…पर एक कवि का जाना
एक नदी के मरने जैसा है,
एक नदी का मरना
पानी के हजारों रास्तों के मरने जैसा है
कल्पना की कोई सुंदर चिडि़या जब मरती है
तो हजारों पंख झड़ते हैं संवेदना के
यह उस पल के लिए
पूरे आकाश के मरने जैसा है ।

एक कवि का जाना
सचमुच
कितना कुछ खाली कर जाता है
मन के कोने- अंतरे से
अवसाद से भर जाता है अहसास
कितना उदास लगता है समय
जैसे हमारे होने से टूट कर
कुछ खो गया हो अनंत शून्य में…

एक कवि का जाना
सत्ता के गलियारे में
भले ही राजकीय शोक नहीं हो
कि झंडे को झुकाया जाए
उसे तोपों की सलामी दी जाए,
पर दुनिया के लिए सोचने वालों के लिए
यह सबसे बड़ा शोक है !


(वरिष्ठ साहित्यकार प्रिंसिपल पूर्णिया महिला कलेज पूर्णिया, बिहार, भारत ।)
[email protected]


यौटै हो हिमाल

प्रेम

फरक– १४