• २०७९ असोज १९ बुधबार

दिसम्बर की गुनगुनी धूप

सविता वर्मा ‘गज़ल’

सविता वर्मा ‘गज़ल’

कभी- कभी दिसम्बर की…
गुनगुनी धूप मक मे. बैठ..
सोचने लगती हूँ…
हर बिता हुआ पल कुछ देर ठहर ….
और फिर…..
जीवन रूपी सलाईयो पर एक एक कुंदा..
बुनने लगती हूँ सुंदर डिजायन भविष्य के…
ताकि…….
सुंदर स्वरूप सी लगे जिंदगी…..
ठहरे न कभी…
सुनो ! मत उधेड़ना तुम !…
कभी इन सुंदर डिजायनो को…
किसी नये डिजायन के मोह मक में पडकर कभी…
वरना तो !
उलझकर रह जायेगी जिंदगी….
उलझे रिश्तों की सिलवटों के साथ ।।

 


(कथाकार एवं कवयित्री, मुजफ्फरनगर, बिजनौर, भारत ।)
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