• २०७९ असोज १८ मङ्गलबार

गड़िया

डा विनोद 'कैमूरी'

डा विनोद 'कैमूरी'

लिखऽ तानी चिठी संईया, बुझ लिहऽ तार हऽ؛
गड़िया पकऽड़ लिहऽ, किरिया हमार हऽ؛

रही रही याद आवे, तोहरी सुरतिया؛
केतना बिसरबऽ राजा, हमरो पिरितिया؛
जनी छछनावऽ हमके, ई दऊलत तोहार हऽ؛
गड़िया पकऽड़ लिहऽ, किरिया हमार हऽ؛

लहरल जवनिया बा, लपके जामाना؛
कांहे रऊवा भईलीं सईया, एतना बेगाना؛
दिल दहकाई काहे, दिल तऽ दिलदार हऽ؛
गड़िया पकऽड़ लिहऽ, किरिया हमार हऽ؛

सुनीला कि बहरा में, का का ना होला؛
नज़र न लागे हमरे, दिल के सलोना؛
मनवा के बान्ह रखिहऽ, इहे एकरार बा؛
गड़िया पकऽड़ लिहऽ, किरिया हमार बा؛

असरा पिरितिया कऽ, दियना जराईं؛
मिसिर विनोद नाही, बूझी हऽ पराई؛
जनमे जनमवा कऽ, दिल वाला प्यार हऽ؛
गड़िया पकऽड़ लिहऽ, किरिया हमार हऽ؛


(पर्यावरणविद्/ समाजिक अभियंर्ता कवि, गीतकार, लेखक । रामगढ, कैमूर, बिहार, भारत)
ईमेल[email protected]