• २०७९ असोज १९ बुधबार

देशक हाल

अंशु झा

अंशु झा

आँखि पसारिकऽ देखू,
केहन बनल अछि देशक हाल,
गरीबहा सब अन्न–अन्न कऽ मरै,
मिडिल क्लासक हाल बेहाल,
आँखि पसारिकऽ देखू,
केहन बनल अछि देशक हाल ।
मन्त्री नेता, शानसँ घूमय,
चारि चकियामें भऽ सबार,
बालकनीमें बसि धनिकहा,
चाय पिबथि पढथि अखबार,
ऊपरेसँ पूछथि की हाल चाल,
आँखि पसारिकऽ देखू,
केहन बनल अछि देशक हाल ।
खतम भऽगेल सब खेल तमाशा,
छूटिगेल सबहक रोजी रोटी,
घर घरमें जे निघैंट गेलै आब,
दाइल चाउरक भरल कोठी,
नोंइच नोंइच की खेता आब खाल ।
आँखि पसारिकऽ देखू,
केहन बनल अछि देशक हाल ।
ककरा लग जेतै हाथ पसारऽ,
सबतरि बहलछै एकहि बसात,
भूखल पेट जे मूसबा कुदकय,
पानि पिबि करैतछै परात,
सुखाकऽ कारी भऽ गेल छै,
आब की देखब मुंह लाल लाल ।
आँखि पसारिकऽ देखू,
केहन बनल अछि देशक हाल ।
पहाडमें पहिरो, तराईमें दाहर,
बज्र खसाबे विधाता गरीबहे कपार,
बाल बच्चा सब अनाथ भेल छै,
के करत ओकर प्रतिपाल ।
आँखि पसारिकऽ देखू,
केहन बनल अछि देशक हाल ।

(स्वतंत्र लेखन)
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