• २०७९ असोज १६ आइतबार

हमरा बुझल अछि

अंशु कुमारी झा

अंशु कुमारी झा

हमरा बुझल अछि
देखने छि गरीबी के बड लगसे,
ताहिसे बुझल अछि,
इच्छा पूरा करैक चाहत,
कि होइत छैक,
जखन ककरो देखलौं,
दर्दमें तडपईत,
त लागल इ दर्द,
ओकर नहि हमर छि,
कियाक त हमरा बुझल अछि,
दर्द से तडपइक टिस केहन होइत छैक ।
फूलके जं देखलौं टुटइत,
अपन डाइरसे,
त अनुभव भेल स्वयम् से टूटबाक,
कियाक त हमरा बुझल अछि,
बियाहक बाद बेटी के माय से दूर भेनाई,
केहेन होइत छैक ।
हमरा बुझल अछि,
अपनसे बिछोडक दुख,
कियाक त हम अपने,
घरमें देखने छि,
जखन कियो कुसमय,
सदाके लेल छोइड जाइत छथि,
त ओ विदाई केहेन होइत छैक ।
हमरा बुझल अछि ।
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