• २०७९ असोज १९ बुधबार

आत्मदंश

डॉ. संजय कुमार सिंह

डॉ. संजय कुमार सिंह

महुआ नाम था उसका । रूप और लावण्य भी महुआ जैसा । मह–मह गमक ! दूध से नहाया गोरा रंग । तिस पर फूलों की चोटी !
वह टोकड़े में महुआ बीन रही थी ।
इन्द्रलोक से उतर कर करकू ने कंकड़ फेंका । पीठ पर गुलेंती लगी, तो वह बिछल गयी ।
‘क्या है रे ?’ वह चौंकी, ‘तू यहाँ ?’
‘मैं तुमसे प्रेम करता हूँ ।’ करकू ने कहा, ‘मैं हर जगह तुम्हें दिखूँगा ।’
‘बड़ा आया प्रेम करने वाला !’ वह हँसी, ‘काला–करकूटा ।’
‘रंग से जो काला होता है, उसका दिल गोरा होता है…, ’ उसने हँस कर कहा, ‘और जो रंग से गोरा होता है, उसका दिल काला ।’
महुआ ने कुछ पल सोच कर कहा, ‘अब जो हो, मेरी शादी जीतपुर के तेज प्रताप मरड़ के बेटे संपत से हो रही है…संपत शहर में पढ़ता है…।’
‘दूधो नहाओ, पूतो फलो ।’ करकू ने कहा, ‘तेरी राजी–खुशी ।’
कहते हैं, महुआ के सारे फूल झड़ गए । घोड़े पर चढ़ कर करकू के अन्दर का गोरा राजकुमार वापस इन्द्रलोक लौट गया ।
नैना नदी में पछाड़ खाकर कुछ लहरें डूब गयीं…।

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आज सोचती है, तो महुआ को लगता है, सचमुच दूधों नहाने और पूतों फलने के बाद भी संपत बाबू की दुनिया में वह खुश नहीं है । अफसर आदमी कितना खयाल करे उसका ! वह कहती भी तो नहीं । अब संपत बाबू पर उंगली उठाने से फायदा ? जो जी आए करो ! लाज का पानी उतरे तो नदी तक सूख जाती है । एक नदी सूख गयी महुआ के अंदर ! एक मादक गंध मर गयी ! मरती गयी । शहर बदलते रहे, मकान बदलते रहे । संपत बाबू की दुनिया वैसी ही रही, दफ्तर, पार्टी, और क्लब से घिरी हुई !
क्या कहे महुआ ! करकू को दोष दे कि अपने भाग को ?
आज माँ का फोन आया, तो बरसो बाद उसने कहा, ‘मैं गाँव जाऊँगी संपत बाबू ।’
‘जाओ !’ उन्होंने बेतकल्लुफी से कहा ।
‘आप नहीं जाएँगे ?’ वह उम्मीद से बोली, ‘माँ याद कर रही थी…’
‘मुझे काम है…’ वे बोले, ‘गाड़ी लो, सुबह चलो, और शाम तक पहुँच जाओ…!’
‘अकेले ?’ वह हलकान हुई ।
‘तो विदेश से बेटे आएँगे ?’ वे बिगड़े, ‘तुम कलक्टर की बीबी हो, पर गँवारपन गया नहीं…’
‘छोडि़ए, मैं नहीं जाऊंँगी ।’ वह नाराज हुई ।
‘अरे हाँ ! सोनापुर का एक आदमी है क्लक्ट्रीएट में ।’ संपत बाबू ने कहा, ‘उसे साथ लगा देता हूँ, वह बोल रहा था, उधर का ही है…’
‘आपने पहले नहीं बताया ?’
‘अब कहा न !’ वे हँसे ।

०००
दूसरे दिन करकू हाजिर हो गया । हाँ करकू ही था शायद ।
ड्राइवर के अतिरिक्त विशेष हिदायत के साथ चपरासी करकू ।
गाड़ी आगे बढ़ी, तो महुआ ने पूछा, ‘कब से हो ?’
‘पिछले साल से मैडम !’
‘क्या नाम है तुम्हारा ?’
‘कालीचरण !’
‘घर ?’
‘यहीं शहर के बगल में ।’
‘तब सोनापुर को कैसे जानते हो ?’
‘साहब ने कहा, तो मान गया !’ वह सिर झुका कर बोला, ‘साहब की राजी–खुशी ! मैं क्या बोलत !’
वह मुस्कुरायी, ‘कमाल है ?’
कालीचरण ने डर कर कहा, ‘एक बात बोलूँ मैडम ?’
‘बोलो ।’
‘साहब नहीं जानेंं ।’
‘क्या ?’
‘यही कि आपको मालूम हो गया कि मैं सोनापुर का नहीं हूँ ।’
महुआ को लगा एक नदी करकू के भीतर भी मर गयी नैना ! उसने एक पल के बाद चौंक कर कहा, ‘क्या होगा ?’
‘नही मैडम, साहब बिगड़ जाएँगे ।’
‘अरे नहीं, साहब लोगों का दिल बड़ा होता है…’ वह तल्खी छिपा कर बोली, ‘इन सब बातों को याद भी नहीं रखते ।’
महुआ को अपनी आवाज दूर कहीं भटकती लगी ।
संपत बाबू ने खूब इन्तजाम किया ।

०००
गाँव पहुँचते ही वह माँ से हिलक कर लिपट गयी । माँ देर तक रोती रही, ‘मेरी बेटी इन्दर लोक जाकर माँ को भी भूल गयी ।’
महुआ ने सोचा, नदी अपने पथ से हट जाए, पेड़ फलना छोड़ दे, पर कोई बेटी माँ को कैसे भूल सकती है ?
‘संपत बाबू नहीं आए ?’ माँ को जैसे कुछ खटका ।
‘वे व्यस्त हैं’ महुआ ने बदल कर कहा ।
‘चार इलाके में जात–बिरादर में संपत बाबू जैसा कोई नहीं ।’ माँ बोली, ‘तुम्हारे बाबू ने हीरा चुना तुम्हारे लिए…’
गाँव के लोग भी संपत बाबू के बारे में पूछते रहे, किसी को क्या कहे महुआ ? दिल की बात दिल ही जाने ! उसने बस इतना कहा, ‘जितना आगे जाओ, अपना सीमान उतना पीछे छूटता है । मगर लौटो, तो वही अपना लगता है ।’ उसका मन हो रहा था कि वह गाँव ही रहे, जाए ही नहीं, पर दूसरे दिन वह वापस चल पड़ी ।
माँ ने संपत बाबू के लिए घी और सत्तू दिए । वह मना नहीं कर सकी । उसे लगा उसके अन्दर कोई आवाज रुन्ध रही है । पहले घर–दलान का सीमान छूटा, फिर नदी–पोखरे ताल–तलैय्ये की स्मृति छूटी और फिर आम–महुआ के बगीचे । गाड़ी ने रफ्तार पकड़ी तो खिड़की के पास हवा जोर से फड़फड़ाने लगी । उसने शीशा चढ़ा दिया ।
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(संप्रत्ति :  प्रिंसिपल, आर.डी.एस.कॉलेज
सालमारी, कटिहार, विहार, भारत)
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