English Poem
ख्वाहिशें कब पूरी हुई
किसी की इस जहान में
यह मानव को उलझाती
बीच भंवर छोड़
साहिल से उस पार बुलाती
हर पल सिज़दा करती
परंतु रंगीन तितली की भांति
पल भर में जाने कहां उड़ जाती
मन बावरा इनके पीछे
दौड़ा चला जाता
परंतु उन्हें पूर्ण करने में
स्वयं को असमर्थ पाता
और अपने प्राण लुटाता
अधूरी ख्वाहिशें
अक्सर बदल देती
अंदाज़ ज़िंदगी का
कब पागल मनवा
जहान में उन्हें पूरा कर पाता
ख्वाहिशें जब जीने का
मक़सद बन जातीं
तभी ही वे पूरी हो पाती
सो! ख्वाहिशों को बना लो
ज़िंदगी का मक़सद
यह उलझायेंगी नहीं तुम्हें
उन्हें खाना-पीना
ओढ़ना-बिछौना बना लो
और उनके नाम कर दो ज़िंदगानी
और फ़लसफा समझ उन्हें अपना लो ।
डॉ मुक्ता (गुरुग्राम हरियाणा, भारत)