• २०७९ मंसिर २१ बुधबार

औरत दलित है

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत।

नारी प्रकृति की सर्वश्रेष्ठ रचना/कहलाती वह लक्ष्मी, सरस्वती, पार्वती व दुर्गा/ मां, बेटी, बहन, पत्नी के रूप में सदैव तिरस्कृत/ परन्तु आत्म-सम्मान की रक्षा हित बनती योद्धा। भारतीय नारी में धरती-सी क्षमा व सहनशीलता, सागर की गहराई, आदित्य-सा तेज और चांद-सी शीतल, उज्ज्वल,ज्योत्सना है। दुर्गा के रूप में शेर पर आसीन शक्तिपुंज-सी है, तो सरस्वती के रूप में नीर-क्षीर विवेकी व हंस-वाहिनी है और काली के रूप में रुण्ड-मुण्ड-धारिणी व शत्रुओं का मर्दन करने वाली है। परन्तु एक भारतीय नारी तो अबला है,जो हंसते-हंसते हर सितम सहन कर जाती है और दूसरों की खुशी के लिए वह अपना जीवन होम कर देती है, परन्तु उसके ओंठों से कभी उफ़् नहीं निकलती।

नारी,न+अरि अर्थात् जिसका कोई शत्रु नहीं, क्योंकि वह सुसंस्कृत है, स्व-पर से ऊपर है व राग-द्वेष से कोसों दूर है। वह मंगलकारिणी है और सर्वजन- हिताय जीती है। उसके जीवन का मक़सद खुशियां लुटाना है। वह जीवन में हंसते-हंसते सब दु:ख सहन करती है, इसी प्रतीक्षा में…शायद! उसका शरीक़े- हयात उसके अंतर्मन की पीड़ा को अनुभव कर, उस की भावनाओं की अनुभूति कर सके। परन्तु कहां हो पाता है वह सब…वह मासूम नितांत अकेली, पर्वतों से टकराती, सागर की लहरों में डूबती-उतराती, भविष्य के प्रति आशंकित-आशान्वित, अतीत में झांकती, मन ही मन चीत्कार कर उठती है। उसके हृदय के घाव, जो नासूर बन रिसते रहते हैं.. वह उन्हें सहेजती- संजोती, कर्त्तव्य-पथ पर अडिग, निरंतर अग्रसर होती रहती है। उसके करुण-क्रंदन को सुनने वाला वहां कोई नहीं होता। हर दिन एक नई स्वर्णिम सुबह की इंतज़ार में उसका समय तिल-तिल कर गुज़र जाता है और जीवन के अंतिम दौर में वह हैरान-परेशान सी अपने अतीत में झांकती, स्वयं को दोषी ठहराती है… आखिर क्यों उसने अपना अमूल्य जीवन व्यर्थ नष्ट कर दिया?क्यों वह उस सृष्टि-नियंता से नाता तोड़, इन माया-मोह के बंधनों में फंसी रही? क्यों उसने दूसरों से सुख पाने की अपेक्षा की? परन्तु इन अपेक्षाओं के एवज़ में क्या मिला उसे?

द्रौपदी… पांच पतियों की पत्नी, जिसे धर्मराज युधिष्ठिर ने द्यूत-क्रीड़ा में दांव पर लगा दिया था। उसे बालों से घसीटते हुये राज्यसभा में लाया गया था। सब महायोद्धा किसी न किसी वचन से बंधे हुए थे। वह रोती-चिल्लाती रही, सहायता की ग़ुहार लगाती रही, परन्तु किसी ने उसकी सहायता के लिए हाथ नहीं बढ़ाया।

मालूम नहीं! यह कैसा अनुबंध था और कैसी मर्यादा थी, जिसमें बंधे वे सब राजा धृतराष्ट्र की पुत्रवधु के निर्वस्त्र होने का दृश्य देखते रहे। आंखों से अंधे तो केवल धृतराष्ट्र थे… अन्य सब उपस्थित-जन तो आंखों से अंधे नहीं थे। वह पांच पतियों की पत्नी, भरे दरबार में प्रताड़ित होती रही… रो-रोकर ग़ुहार लगाती रही, परन्तु किसी का हाथ सहायता के लिए आगे नहीं बढ़ा। यह सोचकर ग्लानि होती है, हृदय चीत्कार कर उठता है कि क्या उस भरी सभा सभा में एक भी ज़िन्दा पुरुष नहीं था?

हां! उस युग में यदि कोई पुरुष था तो वह कृष्ण था …जिसने द्रौपदी की लाज बचाई… उसे निर्वस्त्र होने से बचाया। यदि उस युग को नपुंसक युग कहा जाए, तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। धर्मवीर भारती ने तो उसे ‘अंधा युग’ की संज्ञा दे डाली, जो सर्वथा उचित है।

वास्तव में यदि समाज में कोई दलित है, तो वह औरत है… युगों-युगों से शोषित, प्रताड़ित, तिरस्कृत, भले ही वह आधुनिक युग में, हर क्षेत्र में महत्वपूर्ण पद पर आसीन हो। परन्तु स्वयं को सुरक्षित रखना, अपने मान-सम्मान को बरकरार रखना, स्वाभिमान से सिर उठाकर जीना, सचमुच खड़्ग की धार पर चलने के समान है। हर घर में महिला घरेलू हिंसा का शिकार होती है। क्या मात्र कानून बना देने से औरत को न्याय कहां मिल पाया है? शायद यह सर्वथा असंभव है।

यदि कोई महिला साहस कर अपना पक्ष रखने की चेष्टा करती है,तो उस पर आक्षेप-इल्ज़ाम लगाकर इतना ज़लील किया जाता है कि वह समाज में मुंह दिखाने लायक नहीं रह जाती। इसका मुख्य कारण हमारी प्राचीन परंपराएं व जीवन-मूल्य हैं, जिन पर यह पितृसत्तात्मक समाज आधारित है, जिसके अंतर्गत महिला को दोयम दर्जे का प्राणी स्वीकारा जाता है। दूसरा कारण महिला का महिला का दुश्मन होना है। जहां वह दहेज प्रथा को बनाए रखने में योगदान देती है,वहीं भ्रूणहत्या में भी पूर्ण सहयोगिनी रहती है।

यह सार्वभौमिक सत्य है कि महिलाएं समानता का अधिकार पाने में तभी सक्षम हो पाएंगी, जब वे एकजुट होकर महिला अधिकारों के विरोध करने वालों का डटकर सामना करेंगी। अधिकारों के प्रति सजगता व जागरूकता, जहां समाज व परिवार की ज़रूरत है, वहीं कर्त्तव्यनिष्ठता की भी दरक़ार है।

दहेज उत्पीड़न, छेड़छाड़, अपहरण, फ़िरौती व बलात्कार के हादसे हमारे सम्मुख घटित होते हैं। आजकल तेज़ाब डालना, आंखों में मिर्च का पाउडर डालना, चौराहे पर इज़्ज़त लूटना, गोली चलाते हुए भरे बाज़ार से निकल जाना आम बात हो गई है। मनचलों का फब्तियां कसना, विरोध करने पर उसे घसीट कर गाड़ी में ज़बरदस्ती डालकर, बलात्कार कर क्षत-विक्षत दशा में, सड़क या निर्जन स्थान पर फेंक देना तथा सबूत मिटाने के लिए हत्या करने जैसी घटनाएं सामान्य हो गई हैं, जो सभ्य समाज के मुख पर तमाचा हैं। परन्तु नहीं कर पाते हैं हम उनका विरोध…क्योंकि हमारा ज़मीर मर चुका है और हम दहशत के साये में जीने के आदी हो गए हैं। हम हर पल अपनी व अपने परिवार की सुरक्षा के बारे में चिंतित रहते हैं और हरपल भयभीत रहते हैं कि कहीं विरोध जताने पर ऐसा ही कोई अप्रत्याशित हादसा हमारे परिवार के साथ घटित न हो जाये।

यही आत्मकेन्द्रितता,स्वार्थपरता व एकांगिता दुश्मनों के हौसले बुलंद करती है। दुर्भाग्यवश ऐसे मामले अदालतों में वर्षों तक चलते हैं और इस बीच न्याय की प्रतीक्षा में महिलाएं टूट जाती हैं या परिवार व समाज के लोग उन्हें तोड़ डालते हैं। कुछ तो ज़िल्लत भरी ज़िन्दगी से सदैव के लिए मुख मोड़ लेती हैं और संसार को अलविदा कह रुख़्सत हो जाती हैं। ऐसे भयावह अंजाम को देख अन्य महिलाएं अपनी सोच बदलने को विवश हो उसे अपनी नियति स्वीकार लेती हैं और ऐसी विषम परिस्थितियों में वे अदालत के द्वार पर दस्तक न देने का निर्णय ले बैठती हैं।

यदि हम स्वस्थ समाज की संरचना करना चाहते हैं, तो औरत को अपने अधिकारों के प्रति सजग होना होगा और इस तथ्य को स्वीकारना होगा कि यदि अधिकार मांगने से नहीं मिलते, तो उन्हें छीनने में संकोच नहीं करना चाहिए, इसमें कोई बुराई नहीं है। गीता में भी अन्याय करने वाले से अन्याय सहने वाले को अधिक दोषी ठहराया गया है। सो! अब उसे सदियों पुरानी निद्रा से जागना होगा…अपने अस्तित्व को पहचानना होगा …अपने भीतर सुप्त शक्तियों को जाग्रत करना होगा। उन्हें कलयुग में दुर्गा और काली बन कर, शत्रुओं का मर्दन करना होगा, तभी वे आत्मसम्मान की रक्षा हित सिर उठाकर जी पायेंगी। आज वे जीवन के हर क्षेत्र में सफल हो रही हैं।सोचने का विषय यह है कि वे घर में पति से समानता का अधिकार क्यों नहीं ले पा रहीं। क्यों वे हर पल पति की उपेक्षा का शिकार होती हैं… प्रताड़ित और तिरस्कृत होती हैं? वह सबला बनकर क्यों अपना जीवन बसर नही करतीं? वे पहले भी सशक्त थी और आज भी सशक्त,समर्थ व सक्षम हैं। वे हर आपदा का सामना पूरे दमख़म से कर सकती हैं। परन्तु उन्हें पुरुष के बनाए हुए चक्रव्यूह से स्वयं को मुक्त करना होगा… स्वतंत्र होकर उन्मुक्त भाव से जीना होगा। आज भी उनका है और कल भी उनका होगा। उन्हें मील का पत्थर बनना होगा…एक नया इतिहास रचना होगा। अंत में ‘बहुत ज़ुल्म कर चुके /अनगिनत बंधन में बांध चुके / मुझमें साहस औ आत्मविश्वास है इतना /समर्थ हूं मैं /छू सकती हूं /आकाश की बुलंदियां।इन पंक्तियों के साथ अपनी लेखनी को विश्राम देती हूं।


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नववर्ष…