भाष्कर आइ स्वयम विवाहक प्रस्ताव लऽ कऽ आएल छलाह । हुँनक प्रस्ताव अप्रत्याशित रुपमे आएल छलैक । प्रस्ताव अनुचित नइ छलैक मुदा हम प्रतिक्रिया बिहीन रहि गेल छलहुँ, किए तऽ विगतकेँ हम जतेक अन्ठियाबऽ आ बिसरए चाहैत छी, ओ घुरि–फिरिकऽ ओतवे आगतमे हावि भऽ जाइत अlछ ।

पुनरावृत्तिक डर कतहु ने कतहु एखनहुँ मनमे गढल अछि ।

भाष्कर किंकर्तव्यविमुढ भऽ बैसल छथि । दूनू गोटेक बीच मौनताक पारदर्शी भीत अनायासे बनिगेल अछि । भाष्करकेँ चेहरामे अनायास प्रविणजीक स्वरुप झलकि जाइत अछि आ समय फेर हमरा दश वर्ख पूर्व धकेलि देैत अछि…..।

कलात्मक ढंगसँ सजाएल बारीक कियारीमे रंग–विरंगक फूल फूलाएल छलैक । बड जतनसँ बारीक फूलसभक रेख–देख करैत रहैत छलाह ओ । मुदा तैयो बारीमे अनेरो बहुतरास फूलक गाछसभ झारझंखार जँका बेर–कुबेर, यत्र–तत्र स्वयम उगि जाइत छलैक ।

सुन्दर तऽ ओहो फूलसव छलैक मुदा बारीक सौन्दर्यकेँ ओ बेगारु फूलक गाछसव विरुप बनाऽ दैत छलैक । ते अनेरो जनमल ओ गाछसबकँे नोचिकऽ फेकवाक विकल्प नइ रहैत छलैक ।

बारीक सफाइसंग ओ बेगारु फूलसभ निरन्तर सफाया होइत रहैत छलैक । मृत फूलक गाछसबकेँ देखि मनक कोनो कोणमे कचोट होइत छल आ सोंचैत छलिएक जीवनमे अनमेल बहुत चिज जँ एहिना लोक नोचि कऽ फेंकि सकितए…..।

हमहुँ वेगारु फूलेसन हुँनक जीवनमे वलात फूलाएल छलिएक । ओहो हमर भाग्यमे अनिक्षित पलासक फूलसन ओहिना फूलाएल छलाह, जेकरा प्रति मालीकेँ कोनहुँ भाव वा लगाव नइ छलैक । हँ कोनहँु लगाव नइ ।

जडिसँ उखरल फूलक मृत्यु मरैत आ मौलाइत रहैत छलहुँ हरदम । सोंचैत छलिएक, आखिर मृत्यु की छैक ? स्पन्दनहीन भऽ चितापर चढि़ अग्नि–समाधी लेब मात्र मृत्यु छैक ? की अनिक्षित जीवनशैली आ तेकर अन्तहीन पीडासवक अग्निशिखामे हर क्षण दन–दन जरबऽ, जरैत रहब मृत्यु नइ छैक ?

…..प्रत्येक दिन एहने चिन्तन करैत करैत विगत दश वर्खसँ मृत्यु तऽ जिवति आवि रहल छलहुँ मुदा तैयो ओ शास्वत अग्निशिखामे प्रत्येक पल झुलसियोकऽ हम दूनू कुन्दन नइ होबऽ सकलहुँ । एकहि गोट विकल्प छलैक, मृत्युक बाट छोडि जीवन चूनि लेब । तें हम दूनू पृथक मुदा छुटकाराक समानान्तर यात्रापर बढि गेलहुँँ ।

अनजान यात्रा सहज नइ होइत छैक । फेर इ तऽ लोकक नजरमे समाज विरोधी ओ कृत्य छलैक जेकरा हमर मैथिल समाज एखनहुँ सहज स्वीकार नइ कऽ सकैत अछि । हमरासभक तलाककेर प्रसंग सिगरेट फैक्ट्रिककेँ कर्कश शयरणकेर तरंग जँका ततेक दूर धइर फैललैक जे हम रातारात सर्व परिचित भऽ गेलहुँ । कुख्यात ।

…..हमरा बुझल छल इ यात्रा कठिनसँ बेस अन्कन्टाह सावित हएत ।

जाहि बातक डर छल सैह भेलैक, हम डिवोर्सी महिलाक रुपमे मात्र परिचित रहि गेलहुँ । हमर वास्तविक नाम–प्रतिष्ठा, ओ एक घटनासँ मूल्यांकन होइत रहल । टोल समाजमे हम मात्र कन्ट्रोवर्सीक पात्र बनिकऽ रहि गेलहुँ ।

पुरुषकेर तुल्नामे महिलासभक दूर्वचन सिधे हृदयपर घात करैत छल । हुँनकासभक नजरिमे हम समाज किवां स्त्रीसवकेँ भाडवाक काज कएने छलिएक । सिल्ली वूमन्स ! कोंढ लागल दूगोट मनुखकेँ रोगसँ मुक्ति भेटलैक से बातक चेत एखनहुँ नइ छलैक लोकमे । लागल जेना चेतनाक अन्हार एखनहुँ चारुभरि पसरल छैके ।

दश वर्खक दाम्पत्य जीवनक नम्हर आरोह–अवरोह तयऽ करलाक बादो, हम दूनू अपन सम्बन्धकेँ चिरस्थायी नइ बनाए सकलहुँ । सम्बन्धक विखण्डन तऽ सब देख्ने छलैक मुदा विवाहक पहिल वर्खसँ दाम्पत्यक जडिमे लागल घून ओ खखरी होइत जा रहल सम्बन्ध तऽ मात्र हम दूनू भोग्ने छलहुँ । निरर्थक आ निस्सार भोगैत जा रहल छलहँु ।

विवाहक पहिल वर्खकेर पहिल पहरमे सेहो हमरा प्रेमक गहिंर आभाष नइ भेल छल । ओ हरदम हमर सोझा रहैत लछाह मुदा ने जानि किए हुँनक होएवाक कौमार्य आभाष हमरा कहियो नइ भेल छल । प्रेमकेर प्रत्येक क्रियाकलाप रसहीन सावित होइत छल । यौनकेर प्रत्येक उत्कर्ष स्पर्शहीन लगैत रहल । एकदोसराक लेल हमसब सो–पिस बनिकऽ रहिगेल छलहुँ ।

पहिने लगैत छल इसभ मात्र हमरे सोंच अछि । नितान्त हमरे भावनाक उपज । हँुनका हमर स्पर्श आ हमर शरिरक नवेली सुगन्धसँ प्रेमील आभाष आ तृप्ति आवश्य भेटैत हेतैन तें तऽ ओ हरदम हमर ऋतदास भेल रहैत छथि । मुदा ओ सब फगत सम्बन्धकेर नायाब उर्जा मात्र सावित भेलैक ओहिना जेना नयाँ वस्तु प्रतिकेर आर्कषण । किछ काल लेल…..किछ महिनाक लेल…..।

एकाध महिनाक बाद हमरासवक बीच सम्बन्धक सम्पूर्ण हिसाब प्रकृयागत मात्र चलैत रहल । भितरसँ हम दूनू, एकदोसरासँ कटले तऽ छलहुँ । जुडाब भेवे कहिया केलैक । मात्र तनकेर समागम होइत रहल । मनकेर सम–आगम तऽ कहियो भेवे नइ केलैक । फेर कोना कऽ दाम्पत्यक सुखल वृक्षकेँ अनिक्षाक सुष्क माटिक बले जोगाऽ सकैत छलिएक । आखिर कहिया धरि ?

सम्बन्धक रोमाञ्च तऽ ठंढाइए गेल छलैक । कखनोकाल एक दोसराकसँ बातचित करबाक इक्षाशक्ति सेहो नइ जगैत छल । केँ कखैन सूतैत छलहुँ आ कखैन जगैत छलहुँ तेकर हिसाब किताब राखब सेहो छोडि देने छलिएक । महिनोसँ ।

दाम्पत्यक आँचकेँ उझकेबाक प्रयत्न नइ केलिएक सेहो नइ । अपन मनकेँ स्वयम हुँनका प्रति वलात आशक्त आ आकर्षित करबाक लाखों प्रयत्न कएने छलिएक । निरन्तर करैत रहलिएक मुदा जानि नइ किए कहियो मन–वचनसँ स्वयमकँे हुनका समर्पण नइ कऽ सकलहुँ । प्रेमक आँचकँे कतबौ उझकौलिएक मुदा ओ तापसँ बेसी जलन दैत रहल ।

प्रेमक रोमाञ्च ओ जादूयी आभाषे वेगर हम प्रेमक आडम्बर भोगैत ओ भोगाइत रहलहुँ । मुदा एहि भोगाइसभमे मानसिक आघात कतेक गहिंर ओ पीडादायी होइत छल सेकर एहसास भोगनाहरिए बूझि सकैत अछि ।

परिस्थीति एतेक विकट भ चुकल छलैक जे कखनोकाल हुँनक सानिध्यसँ सेहो तनाव उत्पन्न होइत छल । ओ स्वयम सेहो हमर उपस्थीतिसँ भागल–भागल फिरैत छलाह से बात हमहुँ भाँपि लेने छलिएक मुदा उपायकेर कोनहुँ बाट नइ देख्नाजाइत छल ।

हम दूनू दिन दिने आर जेना अल्पभाषि होइत जारहल छलहुँ । एना नइ जे दूरिक आभाष हमरा दूनूके बोध नइ होइत छल । दूनू गोटे ओ दरार आ दूरिकेँ कम करबाक हरसंभव प्रयत्न करैत छलिएक मुदा सबकिछ वेस्वाद आ आडम्बर मात्र साबित होइत छलैक । जाहि कारने आर्कषणकेर बदला जेना विकर्षण आर बढि जाइत छलैक । लगैत छल किछ दिनमे हमरा दूनूक बिच मौनतासब मात्र बात करतैक । चुपचाप चुपचाप ।

फेर जाइन नइ किए, एक दोसराक बाध्यता सेहो दुखाए लागल छल । भावनाक कोनो तन्तु हृदयमे जागृत छल जे हँुनका एहि बन्धनमे छटपटाइत हम देखि नइ पवैत छलहुँ । ओहो आहत होइत छलाह हमर उदासी देखि, हमर बाध्यताक डरीर देखि मुदा…..।

मुदा निकासक बाट नइ देख्ना जाइत छल । ताहि समयमे सम्बन्धविच्छेदब बाते बड अजगुत बुझिपडैत छल ।

एना नइ जे हँुनकामे वा हमरामे कोनो कमी छलैक । नहः । हुँनक व्यक्तित्व अपरिमेय छलैक । सुन्दर ओ शालिन । मुदा जाइन नई किए हुँनका प्रति भावनात्मक झुकाब कहियो–कखनो उत्पन्न नइ होइत छल । भरि पाँझ आलिग्नमे बान्हि लेबाक सन उताहुलता हमरा मनमे कहियो नइ भेल । कोनहुँ एक क्षणमे सेहो हम प्रेमसँ व्याकुल वा आत्मासँ सर्मपित नइ होबए सकलहुँ । ओहो तऽ नइ होवए सकलाह ।

सम्बन्धकेँ गतिशिल बनेबाक उपक्रम संगहि हम दू बेर गर्भवति सेहो भेलिएक । लागल जे टुटैत जारहल सम्बन्धक कमजोर सूतकेँ आब यैह सन्तानक माया बान्हि सकत…..मुदा हमर दूनू प्रयास असफल रहल । कोढिसब फूलएबासँ पहिनहि वृक्षसँ झहरि गेलैक । फेर सम्बन्धकेँ नविकरण करबाकलेल हमरालग कोनहुँ हत्कण्डा नइ रहिगेल छल ।

कहियोकाल सम्बन्धक तन्तुसब बिनु बातकेँ एतेक उलझि जाइत छलैक जे हम दूनू एकदोसराक छायासँ सेहो दूर भागऽ चाहैत छलहुँ । हमरासबक बनाबटी सम्बन्धकेर तिक्तता आब घैलसँ अफराद भऽ बाहर खसऽ लागल छलैक । चारुभरि पसरऽ लागल छलैक । हम चाहियोकऽ ओ बहाब सबकेँ रोकि नइ पाबि रहल छलहुँ । नियन्त्रण पर हमर जोर नइ छल ।

लोकक नजरि प्रश्नवाचक वनि पडैत रहल मुदा हमरा लग आँखि चोराकऽ बचबाक चेष्टाक अलाबे कोनहुँ विकल्प नइ छल ।

कहल जाइत छैक पति–पत्नीक बिचकेर प्रेम, प्रणय, झगडा ओ सल्लाह सयनकक्षसँ बाहर नइ देखार होएबाक चाहि मुदा हमरासबक बिचकेर कटुता सरेबजार होइत जारहल छलैक । सबहक कटाक्ष मात्र हमरे उपर पडैत छलैक…..लगैत छल जेना एहि सम्बन्केँ बनाकऽ आ जोगाकऽ रखबाक जिम्मेबारी मात्र हमरे छैक ।

लोकसभ पर तामस उठैत छल । बहुतो बेर आक्रोशमे आइव जाइत छलहुँ । मुदा फेर सोंचैत छलिएक…..सनातनसँ सम्बन्धक अभिभारा महिले तऽ उठवैत आइव रहल छैक । यैह संस्कारसँ प्रपोषित अइछ हमर समाज आ परिवार, तें तऽ सम्पूर्ण दोसारोपन हमरे उपर होइत छैक । ने हम लोकक दृष्टिकोण बदैल सकैत छलहुँ आ ने आत्मघात कऽ सकैत छलहुँ ।

परिस्थीतिक घुटन असहनीय भ गेल छलैक । की तऽ सम्बन्धकेँ यथास्थितिमे स्वीकार कऽ आडम्बर जीवति रही आकी छुटकाराकेर नया डेग उठावि । दूनू परिस्थीति महाघातक छलैक । हम मानसिक रुपमे थकित भ चुकल छलहुँ मन्थन करबाक सामथ्र्य कहाँ छल ।

मुदा एहि क्षणमे हम वहिष्कार आ तिरष्कारक डरसँ बहुत उपर उठि चुकल छलहुँ । किए तऽ घरक एक कोठरिक भितर हम दूनू पूर्ण अपरिचित भऽ गेल छलहुँ । कोनहुँ औपचारिकता बाँकी नइ रहिगेल छल । पति–पत्नीक बिचकेर सम्बन्ध थोर–बहुत कोठरीक बाहर मात्र प्रदर्शित करैत छलहुँ । देखावटी रुपसँ ।

अन्ततः हम दूनू अपन अपन जीवनकेँ एकदोसराक संग निस्तेज आ बाध्यात्मक रुपे जबरदस्ती जोड्बासँ नीक अलग होएवाक निर्णय पर पहुँचल छलहुँ । इएह एकगोट निर्णय छलैक जे हमरा दूनूक बिच सहमतिसँ पारित भेल छलैक ।

एना नइ छल जे परिवार टुटवाक आ सबहक प्रेमसँ विहिन भऽ जेबाक भय नइ छल । इएह डर तऽ छलैक जे विगत दश वर्खसँ एकदोसराकेँ वाध्यात्मक सम्बन्धक फन्दामे बाइन्हकऽ राख्ने छल । मुदा ताहि डरसँ हम दूनू अपन बाँकीकेँ जीवन दूर्घटीत नइ कऽ सकैत छलहुँ ।

तलाक पश्चात हम नैहर आ सासुर दूनू परिवारसँ परित्यक्ता भऽ गेलहँु । दामपत्यक सम्बन्धसँ मात्र नइ एक गोट बेटी आ पूतहुकेर सम्बन्धसँ सेहो सम्बन्धविच्छेद भऽ गेल छल । समाजीक वहिष्करण तऽ होएवाक छलैके, अफिसमे सेहो हमर साख खसिपडल छल ।

मुदा एहि दूर्वल क्षणमे हमर मनोबल अप्रत्यासीत रुपसँ बहुत बढि गेल छल । सकारात्मक सोंचकेर विकास भेल छल । हम काममे प्रगति कऽरहल छलहुँ । संभवतः मनुखक मनक स्वतन्त्रता आ शान्ति सबसँ महत्वपूर्ण तत्व छैक ते तऽ हम जीवनक एहन कठिन मोडपर सेहो दूर्वल नइ भऽ वरण आर उर्जावान आ दृढ होवए सकल छलहुँ । मन संतुष्ट ओ स्वतन्त्र छल ।

भितर एहि बातक संतोख सेहो छल जे एकगोट गुम्सल जीवनकेँ हमर अडिग निर्णसँ मुक्ति भेटलैक । प्रविणजी मनेमन आवश्य हमरा धन्यवाद देने हेताह । ओ स्वयम हमरा तलाक देवालए आगा नइ वढि पावि रहल छलाह । जाइन नइ कोन बाधा हँुनक बाट छेकने छलैक ।

हँ, तलाककेर छः महिनाक बाद ओ पुनः विवाह कऽ लेलैन । अपन अफिसक कोनो महिला मित्रसँ । हमरा प्रशन्नता भेल छल । अपन जीवनकेँ स्वेक्षासँ आ मनोनुकूल जीवाक स्वतन्त्रता सबकेँ भेटवाक चाहि ।

हमर वहिष्कृत जीवनमे सेहो भाष्करकेर पदार्पण भेल छलैक । लागल समय आ समाज पुनः जीवनमे एकगोट नया सूर्योदयकेर मौका दऽ रहल अइछ ।

भाष्कर हमर कलेजकालीन पुरान मित्र छथि । हमर तलाक प्रसंगकेर बाद हमरासँ विवाहक इक्षा व्यक्त केलनि अइछ । हुँनक विवाह प्रस्तावसँ मनमे रोमाञ्च तऽ आवश्य भेल छल मुदा सोंचैलिए जे विवाह जीवनक अन्तिम पडाव सेहो तऽ नइ छैक । एखैन तऽ नम्हर यात्रा तय करबाक अछि…..।

(लेखन–पत्रकारिता । प्रकाशित कृति दो । आजीवन सदस्य, मैथिली साहित्यकार सभा, जनकपुर)
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