• २०८३ आश्विन २३, शुक्रबार

हार सिर्फ औरत के हिस्से आई है

संदीप तोमर

संदीप तोमर

उसने खपा दी ज़िंदगी
झाड़ू, कपड़े, पोंछा लगाने, चावल बीनने में,
वह सब्ज़ियाँ काटती रही, दाल और छाछ में छौंक लगाती रही,
बिस्तर बिछाती रही,
और जब पुरुष का मन किया,
ख़ुद बिछ गई उसी बिस्तर पर ।

पुरुष ने उतारी अपनी भरपूर थकान,
इस बात से बेफ़िक्र कि इस पूरी क्रिया में वह कितनी थकी,
या उसकी थकान कितनी कम हुई ।

उसने प्रसव की पीड़ा सही और जना फिर एक पुरुष,
जो बड़ा होकर शोषण के क्रम को जारी रखता गया ।
और अगर बच्ची जनी, तो पैदा हुई एक और शोषित ।

उसका मर्द बीमार हुआ तो वह फिर बिछ गई
ताकि घर का मर्द स्वस्थ रहे ।
ख़ुद बीमार हुई तो दर्द से कराहती रही ।

उसका रुदन इतना गहरा था
कि दब गया उसकी साँसों के स्पंदन में ।

राम का न्याय हो या धर्मराज की धर्म-परायणता,
पाषाण-युग हो या संचार-क्रांति का पर्व-
तमाम वैश्विक सभ्यताओं का इतिहास बताता है कि
अस्तित्व के इस अघोषित युद्ध में
हार सिर्फ़ औरतों के हिस्से आई है ।

हाँ, हर युग, हर काल में
औरतें अपनों से ही हारती आई हैं ।

2
प्रेमियों द्वारा होंठ चूमने के दौर में
तुम हिचकिचाते रहे
मेरी अंगुली के पोर तक छूने को।

जब मैंने अनायास ही खींच लिया था तुम्हें अपनी ओर,
रख दिया था तुम्हारा सिर अपने घुटनों पर,
तब तुम
चौंक गए थे इस अप्रत्याशित-सी घटना से।

लेकिन तब भी नहीं जुटा पाए थे साहस
मेरी पीठ पर अपने प्रेम का घेरा बनाने का।
नहीं तय कर पाए थे सफर
मेरे होंठों तक का।

तुमने बस इतना किया, कि
कुछ देर
मेरी आँखों में देखते रहे,
जैसे उनमें
अपने लिए कोई इजाज़त तलाश रहे हो।

फिर धीरे से
मेरी हथेली को अपनी हथेली में लिया,
और इतने भर से
तुम्हारी उँगलियाँ काँपने लगीं।

मैंने उस दिन जाना
प्रेम हमेशा
छू लेने का नाम नहीं होता,
कभी-कभी
किसी के इतने पास बैठकर भी
अपने भीतर की सारी दूरियाँ
तय नहीं कर पाना होता है।

तुम लौट गए थे
बिना मुझे चूमे,
बिना कोई वादा किए-
और मैं देर तक
अपने घुटनों पर
तुम्हारे सिर का वह स्पर्श
सहेजे बैठी रही।

शायद प्रेम
वही था-
जो होंठों तक पहुँचने से पहले ही
हम दोनों के बीच
बहुत कुछ कह गया था।

 


संदीप तोमर, जीवन पार्क उत्तम नगर नई दिल्ली