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सन 1984 से 1988 तक का वह समय आज भी स्मृतियों के आकाश में किसी सुनहरी धूप की तरह चमक उठता है। जिला स्कूल हजारीबाग उन दिनों केवल एक विद्यालय नहीं था,बल्कि संस्कार, अनुशासन और आत्मीयता का एक जीवंत मंदिर था।इसे आदर्श विद्यालय कहा जाता था।नामांकन भी अत्यंत दुर्लभ था।पुराने लाल ईंटों से बनी विशाल इमारत,चौड़े बरामदे,घंटी की गंभीर ध्वनि और प्रार्थना सभा में गूंजती सामूहिक आवाजें—सब कुछ मन में आज भी ताजा है-‘हे प्रभु आनंद दाता ज्ञान हमको दीजिए…….’
उसी विद्यालय में मैं, राजेश और सुधाकर के साथ प्रायः रहा करता था,मित्रों की कमी नहीं थी मुझे, सौभाग्यशाली था मैं, सभी एक से बढ़कर एक । राजेश, सुधाकर के अलावे मुकेश, दिवाकर, मनोज, शैलेन्द्र, अमरनाथ, ब्रजेश, राजेश, सहाय, शैलेन्द्र, संजय, विद्यानंद, श्यामवृक्ष, हरि गोपाल, मनमोहन आदि कई मित्र थे । घर से विद्यालय जाते समय आशीष और दिवाकर साथ होते थे,विद्यालय में अधिकांश समय राजेश, सुधाकर और दिवाकर के साथ बीतता क्योंकि हम एक ही सेक्शन में थे और घनिष्ठता भी थोड़ी ज्यादा थी । विनय भी हमारा मित्र था । उसके पिताजी भी हमे पढ़ाते थे । विद्यालय परिसर में ही उनका आवास था।हम विनय के पास जाते और इमली खाते । हम सबमे सभी विषयों के प्रश्न उत्तर पर चर्चा के साथ-साथ घर की बातें भी होती थीं । हम सबकी दिनचर्या लगभग एक जैसी थी ।राजेश, सुधाकर और मैं कक्षा में प्रायः एक ही बेंच पर बैठता, कभी अन्य मित्र भी साथ होते । गणित के कठिन सवाल को मिलकर हल करता और कभी-कभी उत्तर निकालने की होड़ में एक-दूसरे से बहस करता, यह उत्साह हमारी पढ़ाई को रोचक बना देता था।उन दिनों पढ़ाई केवल अंकों तक सीमित नहीं थी,सीखने में आनंद था और मित्रता में अपनापन ।
गणित के शिक्षक जब ब्लैकबोर्ड पर प्रश्न हल करते थे, तो पूरा वर्ग मंत्रमुग्ध होकर देखता रहता। शिक्षक केवल विषय नहीं पढ़ाते थे,बल्कि जीवन के मूल्य भी सिखाते थे।उनके प्रति छात्रों के मन में अथाह श्रद्धा होती थी। गुरुजी के कक्षा में प्रवेश करते ही पूरा कमरा सम्मान में खड़ा हो जाता। उनकी डांट में भी स्नेह छिपा होता था और उनकी प्रशंसा विद्यार्थियों के लिए किसी पुरस्कार से कम नहीं होती थी।बाल-सुलभ गुण का प्रभाव कुछ ऐसा था कि कुछ शिक्षकों का नामकरण भी कुछ छात्र कर ही देते थे,फिर भी उनके प्रति हमारी श्रद्धा कभी लेश मात्र भी कम नहीं होती थी।उन दिनों विद्यालय में फिल्में भी दिखाई जाती थीं।हमने उसका भी खूब आनंद लिया है।
दोपहर के अवकाश का समय तो मानो मित्रता का उत्सव होता था। हम तीन-चार मित्र साथ बैठकर अपना टिफिन खोलते।किसी के डिब्बे में पराठे होते,किसी के पास सब्जी तो कोई घर का बना अचार लेकर आता। बिना किसी संकोच के सब एक-दूसरे का भोजन साझा करते।वह स्वाद केवल खाने का नहीं,बल्कि आत्मीयता का होता था।शुक्रवार को डेढ़ घंटे का टिफ़िन होता था,कई छात्र घर भी चले जाते थे। पकड़े जाने पर आर्थिक दंड भी लगता।एक बार मैं भी निकलते हुए पकड़ा गया था।गुरुदेव ने पूछा तो मैंने तपाक से झूठ बोल दिया।झूठ बोलने की आदत नहीं थी तो जुबान लड़खड़ा रही थी,गुरुदेव समझ चुके थे-‘पिताजी की तबीयत खराब है और घर पर कोई नहीं है….’दूसरे दिन गुरुदेव घर पहुंच गये,पिताजी ने खूब डांटा,मैंने गुरुदेव से माफी मांगी,फिर ऐसा कभी ना करने की कसम खाई।
स्कूल की छुट्टी के बाद या टिफ़िन के समय कभी-कभी हम पास के छोटे से होटल में जाकर गरमागरम लिट्टी खाते।मिट्टी के चूल्हे की सोंधी खुशबू और दोस्तों के साथ ठहाकों के बीच खाई गई वह लिट्टी आज भी स्मृतियों में वैसी ही महकती है।अगर शेरू का ठेला लगा होता तो झाल मुढ़ी,चना या गर्मी के दिनों में रंग बिरंगी आइस क्रीम खाते।शेरू बड़े प्यार से बर्फ को छील-छील कर शीशे के गिलास में भरकर अलग अलग रंगों से सजाकर हमें देता और हम आनंद- विभोर हो जाते।शेरू हृदय एवं आत्मा से इतना बड़ा था कि पैसे नहीं होने पर भी ना नहीं कहता था-‘कल दे देना बाबू।’उन दिनों साधन सीमित थे पर खुशियाँ असीम थीं।न मोबाइल थे,न सोशल मीडिया फिर भी रिश्तों में गहराई थी और मित्रता में सच्चाई।
पुराने समय के स्कूलों की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वहाँ शिक्षा के साथ संस्कार भी दिए जाते थे। विद्यालय परिवार जैसा लगता था। यदि इस संक्षिप्त संस्मरण में कुछ नाम नहीं लिखूंगा तो बड़ा पाप हो जाएगा।गुरुदेव वर्मा सर,ललित सर,तालेश्वर महतो सर,राजेश्वर सर,राम जी सर,तिवारी सर,सैयद इमाम मल्लिक सर,जय गोविंद सर,हरिवंश सर,गुप्तेश्वर सर,उपाध्याय सर,रजनी सर आदि अभिभावक की तरह मार्गदर्शन करते और विद्यार्थी पूरे आदर से उनकी बातों को जीवन में उतारने का प्रयास करते। विद्यालय प्रांगण में आम के पेड़ के नीचे बैठकर संस्कृत एवं अन्य विषय पढ़ना अत्यंत मनोरम और आनंददायक था।आम के वृक्ष का वह स्वरूप,मधुर गंध आज भी हृदय में ही है।उन दिनों अनुशासन कठोर था लेकिन उसमें प्रेम और आत्मीयता की गर्माहट भी थी।
हमारे विद्यालय में उन दिनों नया-नया कंप्यूटर आया था।वह कालखंड कंप्यूटर युग की शुरुआत थी।हमारे शिक्षक उसमें भी दक्ष थे।राम जी सर हमें कक्षा से बुलाकर कम्प्यूटर दिखाने कक्ष में ले गये थे।अजीब सी हलचल थी हृदय में कि आखिर कंप्यूटर कैसा जीव है जो पूरे देश-विदेश में छा चुका है।राम जी सर सभी बच्चों के नाम स्क्रीन पर टाइप करते और कंप्यूटर सभी नामों को अल्फाबेट के हिसाब से लगा देता।हम सभी बच्चे आश्चर्यचकित हो जाते,फिर हमारे बीच वही चर्चा का विषय बन जाता।राम जी सर हमारे विज्ञान शिक्षक थे,प्रयोगशाला में ले जाकर मोमबत्ती बनाना भी उन्होंने सिखाया था।
बहुत कुछ सीखा हमने।गुरु के प्रति श्रद्धा का चमत्कार यह है कि आज भी हम सभी छात्र ईमानदार हैं,संवेदनशील हैं।विनम्रता हमारी परिभाषा है और हमारी सादगी हमारे जीवन की डोर।देशभक्ति हम सबमे कूट-कूटकर भरी है।गर्व है मुझे हमारे उस कालखंड पर जिसने हमें संस्कार से पल्लवित-पुष्पित किया।गर्व है मुझे अपने सभी मित्रों पर जिनके स्नेह ने मुझे अपनत्त्व की परिभाषा बताई।आज जीवन के छठे दशक में मैं अपने गुरुदेवों के आशीष का अभिलाषी हूँ।वे जहाँ भी हैं हमारा सादर चरण स्पर्श स्वीकार करें।
आज जब समय बहुत बदल चुका है तब भी हजारीबाग जिला स्कूल की मधुर यादें मन को भावुक कर देती हैं।विस्मरण के इस उम्र में बड़ी मुश्किल से छोटी -छोटी बातों को याद कर एक संस्मरण का स्वरूप देने का प्रयास मैंने किया है।यदि कोई गुरुदेव या मित्र कहीं छूट गये या कोई अन्य त्रुटि रह गयी हो तो मुझे अबोध बालक समझकर क्षमा करेंगे।छोटी-छोटी विनम्र एवं संवेदनशील यादों ने जीवन के उस सुंदर अध्याय को अमर बना दिया है,जिसे समय कभी मिटा नहीं सकता।
अनिल कुमार मिश्र, राँची, भारत।