क्युबाको कविता
जब कौआ गुटर-गुटर-गूं बोले
और बोले कबूतर काँव
छोड़ शहर घर भागो भैया
अपना प्यारा गाँव ।
बड़े रंग हैं,ढंग अजब हैं
अलग-अलग है बोली
रंग बदलता रोज है इंसां
निशि दिन इनकी होली ।
जहाँ कहीं भी स्वार्थ छिपा हो
कौआ बदले बोली
काँव करे जब भी कबूतरी
मन में रंग कई,रोज है होली ।
मन जैसा है तन वैसा हो
चेहरा भी हो निश्छल
गाँव-शहर पवित्र हो जाए
नहीं कहीं हो छल !
बोली मीठी मन में विष है
स्वार्थ हलाहल की हैं लहरें
गाँव-शहर सब हैं खतरे में
कैसे हम संस्कार सहेजें ।
गाँव मे जब तक काँव-काँव है
कौए की आवाज
तब तक ही दिल निश्छल सबका
सुंदर है सब साज़ ।
बदले स्वभाव जब बोली बदले
समझो चाल-चरित्र
गाँव-शहर की खोती गरिमा
दुःख है,चित्र-विचित्र ।
चलो पुराने गाँव चले हम
जहाँ छोटा-सुंदर व्यापार
हर दिल में नेह-स्नेह का जादू
मधुर-मधुर व्यवहार ।
गुटर-गुटर क्यों बोला कौआ
यही चिंतन है,मंथन है
कबूतरी काँव क्यों बोली
मंथन है,चिंतन है ।
–अनिल कुमार मिश्र
राँची,भारत ।