• २०८२ मंसिर २३, मंगलवार

सपने

वंदना गुप्ता

वंदना गुप्ता

एक बूढ़ी चील
चाय बगानों से आकर
बैठ जाती है
दस मंजिला इमारत की मुड़ेर पर
कभीकभी कौवे भी
उसे भगा देने के प्रयास में
करते हैं चहलकदमी
पर मुझे लगता है
जैसे वह कोई विरहिणी है
जो कर रहीं हैं वर्षों से
चाय बागान से लौटते
अपने किसी प्रेमी की प्रतीक्षा
या किसी लोककथा की
नायिका है वो
जो ऊंचे छज्जे से देख रही है
प्रिय के घर वापस आने के सपने


(शिक्षिका, स्वतंत्र लेखन, कई काव्यसंग्रह प्रकाशित, सिलीगुडी, पश्चिम बंगाल, भारत)
[email protected]