• २०८२ मंसिर १३, शनिबार

अंत नहीं आदि हैं आद्या शक्ति सीता

डा. श्वेता दीप्ति

डा. श्वेता दीप्ति

सीता धरती से जन्मी एवं ऋषियों मुनियों के साथ पली बढ़ी है । पवित्र भूमि की हल रेखा से सीता के मिलने पर किसानों ने कहा कि वह जनक के बीज का फल नहीं है तो वह उनकी पुत्री कैसे हो सकती है ? इस प्रश्न पर राजा जनक कहते हैं कि, ‘पितृत्व बीज से नहीं हृदय के भीतर से अंकुरित होता है’ और उन्होंने घोषणा की कि, यह धरती की पुत्री भूमिजा है, मैं इसे सीता कहूँगा, वह सीता जिसने मुझे पिता के रूप में चुना है । सीता प्रकृति के पालिका बनने तथा मानव सभ्यता के उदय होने का मूर्त रूप बन कर हमारे समक्ष स्थापित होती है । वेदों में सीता को उर्वरता की भगवती के रूप में मान्यता दी गई है । महाभारत के राम उपाख्यान में सीता जनक की जैविक पुत्री है । कश्मीरी रामावतार चरित्र में सीता रावण की पुत्री है । आनन्द रामायण में विष्णु, पाक्ष नामक राजा को एक फल देते हैं, जिसमें कन्या है, जो लक्ष्मी का अवतार है, वही पार्वती है और वही सीता है । सीता अयोनिजा है, इसलिए वह विशेष है । तात्पर्य यह कि सीता की उत्पत्ति की कई कथाएँ हैं । माता सीता की जन्मस्थली मिथिला की चर्चा रामचरित मानस के उत्तर कांड में कुछ इस तरह हुई है ।

इहाँ वसत मोहि सुनु खग ईशा ।
बीते कलप सात अरु बीसा ॥

अभी से सत्ताइस चौयुगी (सत्य, त्रेता, द्वापर और कलिनामक चतुर्युगी) से पहले त्रेता युग में राम चरित मानस के उत्तर काण्ड में काक भुसुण्डीजी के द्वारा गरूड़ जी को कहे गए इस चौपाइ के आधार पर २७ कल्पों पहले त्रेता युग में ही मिथिला की राजधानी जनकपुर में सतावन पीढी तक चली । ब्रह्मज्ञानी जनकों की वंशावली में बाइसवें जनक श्री सीरध्वज नामक राजा जनक के द्वारा अनेकों वर्ष तक महा अकाल पड़ने पर चलाये गये सुवर्णमय हल के सीर (सीता नामक अग्रभाग) से मिथिला की पावनतम् भूमि के अन्यतम भाग सीतामही (प्रसिद्ध सीतामढी) से आविर्भूत हुई जगज्जननी जनकनन्दिनी सीताजी ने मिथिला को लोकोत्तर गौरव के शिखर पर प्रतिष्ठित कर दिया । जो अयोनिजा परमेश्वरी भगवती के रूप से सर्वत्र पूजित होती हैं ।
माता सीता का जन्म एक रहस्य है सीता के विषय में रामायण और अन्य ग्रंथों में जो उल्लेख मिलता है उसके अनुसार मिथिला के राजा जनक के राज में कई वर्षों से वर्षा नहीं हो रही थी इससे चिंतित होकर जनक ने जब ऋषियों से विचार किया तब ऋषियों ने सलाह दिया कि महाराज स्वयं हल चलाएं तो इन्द्र देव की कृपा हो सकती है । मान्यता है कि बिहार स्थित सीतामढ़ी का पुनौरा गांव वह स्थान है जहां राजा जनक ने हल चलाया था हल चलाते समय हल एक धातु से टकराकर अटक गया राजा जनक ने उस स्थान की खुदाई कराने का आदेश दिया । इस स्थान से एक कलश निकला जिसमें एक सुंदर सी कन्या थी राजा जनक निःसंतान थे इन्होंने कन्या को ईश्वर की कृपा मानकर पुत्री बना लिया हल का फल जिसे सीत कहते हैं उससे टकराने के कारण कलश से कन्या बाहर आयी थी इसलिए कन्या का नाम सीता रखा गया । इस घटना से ज्ञात होता है कि सीता राजा जनक की अपनी पुत्री नहीं थी धरती के अंदर छुपे कलश से प्राप्त होने के कारण सीता खुद को पृथ्वी की पुत्री मानती थी । इसलिए वास्तव में सीता के पिता कौन थे और कलश में सीता कैसे आई यह एक जिज्ञासा का विषय है ।

इसका उल्लेख अलग–अलग भाषाओं में लिखे गये रामायण और कथाओं से प्राप्त होता है । अद्भुत रामायण में उल्लेख है कि ‘रावण कहता है कि जब मैं भूलवश अपनी पुत्री से प्रणय की इच्छा करूं तब वही मेरी मृत्यु का कारण बने रावण के इस कथन से ज्ञात होता है कि सीता रावण की पुत्री थी । अद्भुत रामायण में उल्लेख है कि, गृत्स्मद नामक ब्राह्मण लक्ष्मी को पुत्री रूप मे पाने की कामना से प्रतिदिन एक कलश मे कुश के अग्र भाग से मंत्रोच्चारण के साथ दूध की बूंदें डालता था । एक दिन जब ब्राह्मण कहीं बाहर गया था तब रावण इनकी कुटिया में आया और यहां मौजूद ऋषियों को मारकर उनका रक्त कलश में भर लिया यह कलश लाकर रावण ने मंदोदरी को सौंप दिया ।

रावण ने कहा कि यह तेज विष है, इसे छुपाकर रख दो मंदोदरी रावण की उपेक्षा से दुःखी थी एक दिन जब रावण बाहर गया था तब मौका देखकर मंदोदरी ने कलश में रखा रक्त पी लिया इसके पीने से मंदोदरी गर्भवती हो गयी । लोक लाज के डर से मंदोदरी अपनी पुत्री को कलश में रखकर उस स्थान पर छुपा गयी जहां से जनक ने उसे प्राप्त किया । इस कथा से ज्ञात होता है कि सीता रावण की पुत्री थी जो रावण की मृत्यु की वजह बनी । माँ जानकी के जन्म को लेकर चाहे कितनी ही किवदंतियां या कथाएँ हों किन्तु हम उन्हें जनक पुत्री ही मानते हैं और उन्हें भगवती और लक्ष्मी का स्वरूप मानकर उनकी पूजा करते हैं । हमारे लिए वही सीता मान्य है, जो राजा जनक की पुत्री है, नारी का आदर्श है, अपरिमित है, अपरिभाषित है, असीम है, अनन्त है ।

माँ सीता के दृढ और अडिग चरित्र की गाथा हमें रामचरित मानस से ही प्राप्त होती है । वैसे तो रामायण के अध्ययन से यह पता चलता है कि रामायण की रामकथा में चित्रित प्रायः सभी नारी पात्र एक विशिष्टता लिए हुए हैं । उनमें हिन्दू मूल्यों के प्रति असीम आस्था है, वो त्याग की प्रतिमूर्तियाँ हैं, आदर्श पतिव्रता हैं, और विवेकवान् समर्पणशीला हैं साथ ही कर्तव्यपरायण व युग धर्म की रक्षिका भी हैं । रामायण के कथानक में समय आने पर ये सभी अपनी श्रेष्ठता श्री सिद्ध करती हैं । अगर यह कहा जाए कि रामायण की सम्पूर्ण कथानक को आदर्श मंडित करने में नारी पात्रों की विशेष भूमिका रही है, तो यह गलत नहीं होगा ।

राम सूर्यवंशी हैं । सीता धरती–पुत्री हैं । सूर्य से धरती का संबंध ऊर्जा के बंधन का है । धरती को ऊर्जा सूर्य से प्राप्त होती है । वह सूर्य के चारों ओर डोलती रहती है । इस चक्रमण के कारण ही धरती पर ऋतुएं हैं, दिन–रात हैं, जीवन है, राग रंग है, प्रकृति है । धरती सूर्य से ऊर्जा लेती है और अपने गर्भ से जीव जगत को ऊर्जा देती है । फसलें । वृक्ष, लताएं सभी अपनी जड़ों के माध्यम से धरती से जीवन रस ले पुष्पित पल्लवित होते हैं । सीता धरती की कोख से पैदा हुई उसकी शक्ति हैं । शक्ति या ऊर्जा कभी नष्ट नहीं होती । वह किसी न किसी रूप में बनी रहती है । यह आधुनिक विज्ञान का भी सत्य है । इसीलिए सीता अग्नि परीक्षा में जलकर भस्म नहीं होती । ऊर्जा से ऊर्जा का मिलन होता है और वह एक अदम्य ऊर्जा के रूप में निखरकर विश्व के सामने आती हैं । सीता धरती में इसलिए समाती हैं कि अनन्य ऊर्जा का स्रोत बन सके ।

सीता वह पतिव्रता नारी है, जो अपने स्वाभिमान की रक्षा करना तो जानती ही है, पति के स्वाभिमान को भी आहत नहीं होने देती । सीता सभी परिस्थितियों में अत्यंत दृढ़ता एवं स्वाभिमान के साथ सामने आती है । वह अपनी पीड़ा को अपनी कमजोरी नहीं बनने देती, अगर ऐसा होता तो वह अपनी संतान को चारित्रिक उज्जवलता, दृढ़ता एवं श्रेष्ठ मूल्य नहीं दे पाती । वह राम को पहचानती है और वह यह भी जानती है कि राम का जीवन जन –जन के लिए है । सीता का पृथ्वी में समा जाना न तो उनके द्वारा मृत्यु का वरण है और ना ही राम के प्रति किसी भी प्रकार का रोष इसका कारण है, हाँ ! समाज में व्याप्त रुग्ण मानसिकता का प्रतिफल अवश्य है । अपने ऊपर समाज द्वारा लगाए गए लांछन की प्रतिक्रिया है । यहाँ भी वह राम के रामत्व की रक्षा करती है, उन्हें किसी असमंजस में नहीं रखना चाहती और स्वयं को मुक्त कर हर प्रश्न पर विराम लगा देती है । सीता का यह उज्ज्वल स्वरूप हर युग में पूजित है और रहेगा । आज भी अगर नारी अपने अन्दर सीता के इस दृढ़ स्वरूप को स्थान दे दे तो वह कभी अबला नहीं मानी जाएगी क्योंकि प्रखरता, दृढ़ता और स्वाभिमान उसका गहना होंगे जो उसके आत्मिक सौन्दर्य को परिभाषित करेंगे ।

एक बीज धरती की कोख में डाला जाता है तो उससे असंख्य बीज पैदा होते हैं और प्रकृति का यह क्रम आगे बढ़ता है । शक्ति इसीलिए स्त्री के रूप में अथवा प्रकृति रूप में वर्णित है । सृष्टि में उसी आदि शक्ति के अनंत कण बिखरे हैं । सीता शक्ति बीज हैं इसलिए धरती में समाती हैं, अनेक शक्ति–बीजों को जन्म देने के लिए । सूर्य के तेज को धारण कर उसे पुनः बीज रूप बनाने और इस प्रकार सृष्टिक्रम को आगे बढ़ाने के लिए । सीता बीज है, शक्ति है और समस्त स्त्री तत्व उसी आदि शक्ति के अनंत विद्युत्कण । इसीलिए सीता आदि है अंत नहीं । जब तक सृष्टि है, प्रकृति है, स्त्री शक्ति है, सीता का अस्तित्व है ।


डा. श्वेता दीप्ति


कुरा गर्नलाई कुरै छैन

यौटै हो हिमाल

दहलीज