English Poem
सूरज घूरता क्यों है
रात के पयताने खड़ा होकर
बीते समय की फूलों वाली चादर में
खिल उठते हैं नागफनी के काँटे
गाढी नींद पतली होकर
बह जाती है पाँव से
आँख दौड़ती है
सपनों की अगलगी में
खुद को बचाते हुए
कहाँ बचा कुछ तुम्हारे जाने के बाद
एक पोटली सी बँध रही है
शिकन की शिकवों की
कभी आँखों में झाँक नहीं पाए
लफ्जों को पढ नहीं पाए
कौन चढता(उतरता सीढियाँ
खुले हाथों को गुनाह करार किया
सारे सच झुठलाए तुमने
मोहब्बतों को नाम देकर साजिशों का
फूँक दिया वजूद मेरा
गली गली ुड़ाई राख मेरी
किरदार किसने पढा है किसका
जल गया था खुदा
मेरे सजदे की आखिरी दुआ में
फैलती आग हर शय
भटकती रुह कोई
मत हवा दे अब दरारों को
ढूँढ रहा है समय एक ठिकाना
जहाँ गलत समझ कर
ठुकरा गया घोंसला परिंदा
नदियाँ पीकर
खारा रहा समन्दर ११
अर्चना कुमारी